अन्ना हजारे-शत्रुकीट-धीमा नेट एवं बरसाती यात्रा

ब्लॉ.ललित शर्मा, बुधवार, १७ अगस्त २०११

 

रक्षाबंधन के दो दिन पहले से ही बरसात हो रही थी। इसके साथ नेट भी जवाब दे गया। धीमें-धीमें सांस लेने लगा। मेल बाक्स भी नहीं खुलता था। कम्पयुटर भी इसका साथ देने लगा। सोचा कि पीसी में कोई शत्रुकीट षड़यंत्र पूर्वक प्रवेश कर गया है। इसने यहाँ तक बाधित कर दिया कि चैट बाक्स भी जवाब दे गया। रक्षाबंधन पर मित्रों को शुभकामना संदेश भी नहीं दे सका।  कम्पयुटर को कई बार स्केन किया, सभी फ़ालतु फ़ाईलों को डी लिट की उपाधि बख्शी। सिस्टम रजिस्ट्री क्लीन एवं फ़िक्स की। एक फ़ाईल में छिपे तीन शत्रुकीट मिले, जिनकी छित्तर परेड की। लेकिन हासिल कुछ नहीं आया। समस्या ज्यों की त्यों खड़ी रही। नेट और कम्पयुटर में ताल-मेल नहीं बैठा। अब हारकर इसकी धुलाई सफ़ाई का विचार बनाया और छोड़ दिया।
हमारी छोटी रेल
राखी के दिन सुबह ही ट्रेन पकड़ कर बहन के यहाँ जाने का कार्यक्रम बना लिया। श्रीमती जी ने भी काम पकड़ा दिया, उनकी राखियाँ भी भाटापारा स्टेशन में पहुंचानी थी, रायपुर स्टेशन पर यात्रियों की भीड़ देख कर लगा कि ट्रेन में खड़े होने की जगह भी नहीं मिलने वाली। रक्षाबंधन को यात्रियों की भीड़ बढ जाती है। छत्तीसगढ एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर देखते ही लोग पटरियों के उस पार भी खड़े हो गए, बैक डोर से एन्ट्री करने के लिए। बैक डोर से एन्ट्री करने वालों  को सीट मिल ही जाती है। लेकिन हम सही रास्ते से ही ट्रेन में चढने के लिए कमर कस चुके थे। संसद में बैक डोर (राज्य सभा) से एन्ट्री करने वाले प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाते हैं और फ़्रंट डोर (लोक सभा) से एन्ट्री करने वालों का नम्बर ही नहीं लगता।
बिलासपुर में अंग्रजी पढने-लिखने वाली पगली

ट्रेन आते ही थोड़ी मशक्कत के बाद प्रवेश मिल गया, बालकनी की सीट मिल गयी, रौब काम आ गया। ट्रेन सरकने लगी, मुझे बिलासपुर तक ही जाना था। वहाँ से आगे की यात्रा कार से करनी थी। सभी जगह फ़ोन लगा कर अपने आने की सूचना दे दी। भाटापारा में सालिगराम जी स्टेशन आ चुके थे, उन्हे खिड़की से ही राखियाँ दी, आगे चल पड़े। बिलासपुर पहुंचते साढे बारह बज चुके थे। मैने चीफ़ लेबर कमिश्नर मीणा साहब को फ़ोन पर आने की सूचना दी। थोड़ी देर बाद बहनोई साहब पहुंच चुके थे। मीणा साहब से मिले कई दिन हो गए थे। उनसे मिल कर हम कटघोरा चल पड़े। अरविंद झा जी गाँव गए थे और श्याम कोरी जी का नम्बर घर पर भूल आया था, अन्यथा राम राम तो हो ही जाती।

उमड़-घुमड़ बरसे बदरा

रतनपुर के पास बरसात शुरु हो चुकी थी। इस मार्ग पर कोयला और स्लेग के भारी वाहन (कैप्शुल) चलते हैं। पाली के पास तो सड़क ही गायब हो चुकी  है। पता चला की भारी बरसात का परिणाम है। पाली से कभी चतुरगढ जाने का मन है, अबकी बार नवरात्रि में जाने का प्लान बनाया है। पाली का प्राचीन शिवमंदिर प्रसिद्ध है। बरसों के बाद रास्ते में फ़ुट दिखाई दिए, इन्हे हरियाणा में “हैजा” नाम से संबोधित किया जाता है। क्योंकि गंदे नाले या नाली में उगे फ़ुट खाने से टट्टी-उल्टी होती है और हैजा हो जाता है। इसकी खुश्बु खरबूजे जैसी ही होती है, पर मीठे होने की बजाए थोड़ी सी खंटास लिए होते हैं। हमने “हैजा” खरीद लिया, घर पहुंचने पर इसका ही इस्तेमाल पहले करने की सोची। हैजा खाने के बाद भी हमें हैजा नहीं हुआ। कटघोरा पहुंचने पर देखा कि वहाँ  गड्ढों में सड़क ही नहीं दिखाई दे रही। बरसात का असर कुछ अधिक ही हुआ।

करील-बास्टा

इस इलाके में बांस की करील चोरी छुपे मिलती हैं, करील की सब्जी खाने का इरादा बनाया। लेकिन बहन को करील की सब्जी बनानी नहीं आती, उसने करील मंगा दिया, अब समस्या हो गयी सब्जी बनाने की। बस्तर में इसे बास्टा नाम से जानते हैं। अली सा को फ़ोन लगाया, रैसिपी के लिए, उन्होने अपने एक सहायक का नम्बर दिया और उनसे मैने सब्जी की रैसिपी पूछी। उसने दाल के साथ बनाना बताया। मैने करील की सब्जी खाने का इरादा बदल दिया। तभी संगीता जी का ध्यान आया, तो उन्हे फ़ोन लगा कर पूछा। संगीता जी से सही रैपिसी मिली मन माफ़िक। तब तक करील किसी और को दे दिया गया था। मेरी करील की सब्जी खाने की इच्छा धरी की धरी रह गयी। अब फ़िर किसी दिन आजमा कर देखेगें, जायका इंडिया का।

कोरबा से वापसी

रात भर बरसात होते रही, वापसी कोरबा से करने का विचार बनाया। 11 बजे कोरबा से छत्तीसगढ एक्सप्रेस बिलासपुर तक पैसेंजर बनकर चलती  है। इसका बिलासपुर पहुंचने का समय 1/35 बजे का है, फ़िर वहाँ से 1/45 को झारसुगड़ा-गोंदिया पैसेंजर चलती है जो रायपुर पहुंचाती है। बिलासपुर पहुंच कर दुसरे प्लेटफ़ार्म पर पहुंचा तो ट्रेन खड़ी थी। डिब्बे में सीट मिल गयी, लेकिन ट्रेन एक घंटे खड़ी रही, जिस ट्रेन से आया था पहले वही गयी। इंटरनेट से टाईम देख कर जाने के चक्कर में खड़ी गाड़ी में बैठे रहे। अब विचार बनाया कि बिल्हा स्टेशन में उतरा जाए। बिल्हा स्टेशन बिलासपुर से 3 रुपए की दुरी पर है। बिल्हा में भाई साहब के पास दो घंटे बिता कर रात 10 बजे घर पहुंचा। पुरे दो दिन की बरसाती यात्रा रही। अम्बिकापुर तक जाने का इरादा था लेकिन अगले दिन 15 अगस्त होने के कारण वापस आना पड़ा।

15 अगस्त के कार्यक्रम में

15 अगस्त को सुबह स्कूल में झंडा फ़हराने के बाद अन्य कई जगहों के कार्यक्रमों में भी शरीक होना पड़ता है। कन्या शाला के कार्यक्रम में झंडा उत्तोलन करने के लिए अशोक भैया पहुंच चुके थे। समाचार मिला कि मुख्यमंत्री ने 9 नए जिलों की घोषणा कर दी है। हमारे रायपुर जिले के कई टुकड़े हो गए, महासमुंद, गरियाबंद, बलौदाबाजार, तीन जिले बन गए। अब रायपुर जिला 4 ब्लाकों में ही सिमट कर रह गया। समाचार बढिया था, छोटे जिलों में प्रशासनिक चुस्ती बनी रहती है। विकास के काम भी तेजी से होते हैं। यहाँ के कार्यक्रम को निपटाने के बाद घर पहुंच कर कम्पयुटर की तरफ़ ध्यान दिया। 4 दिनों से आराम कर रहा था। प्रयास के पश्चात भी हालात वही बने रहे। थक हार कर छोड दिया।

मोटे होने का ईलाज

16 तारीख को सुबह उठने के बाद दिमाग में ये ख्याल आते रहा कि आज कोई महत्वपूर्ण दिन है, सोचते रहा कि क्या है आज, कलेंडर देखा तो कोई छुट्टी नहीं थी। (हमारे देश में महत्वपूर्ण दिन छुट्टी रहती है) कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या महत्वपूर्ण है आज। फ़िर याद आया कि आज अन्ना हजारे अनशन पर जाने वाले हैं। सुबह 8 बजे अन्न हजारे की गिरफ़्तारी का समाचार मिला। यह तो होना ही था, जब भ्रष्ट्राचारियों को अपनी खाल बचानी है तो ईमानदारों को ही जेल भेजेगें। मै भी कुछ लिखना चाहता था फ़ेसबुक, ब्लॉग या गुगल प्ल्स पर। लेकिन कम्पयुटर साथ नहीं दे रहा था। तभी मुझे ध्यान आया नेट स्लो होने के पीछे षड़यंत्रकारी ताकतों का तो हाथ नही है। एक्सचेंज में फ़ोन करके अपनी शिकायत दर्ज कराई। 5 बजे सो कर उठने के बाद देखा तो नेट चालु हो गया था।

नेट पर आने के पश्चात पता चला कि कई ब्लागरों के नेट कनेक्शन धीमे चल रहा है, दो दिनों से वे भी परेशान हैं। तब लगा कि नेट धीमे होने के पीछे सरकार की भी कोई चाल हो सकती है। भ्रष्ट्राचार के विरोध एवं अन्ना के समर्थन में ब्लॉगर और फ़ेसबुकिए ही अधिक रहते हैं। अगर नेट धीमा हो जाए  या बंद हो जाए तो ये हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेगें। हल्ला बोल बंद हो जाएगा। समर्थन का नारा सुनाई नहीं देगा। जिनकी सरकार है, जिनके हाथ में पावर है वह कुछ भी कर सकता है। नेट शुरु हुआ तो अन्ना हजारे की रिहाई का समाचार भी समाचार मिला। एक तरफ़ कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी का अन्ना को तू एवं तुम कहने वाला सम्बोधन सुनने मिला तो दुसरी तरफ़ चिदम्बरम का श्री अन्ना हजारे सुनने मिला। भारत की सड़कों पर अन्ना के समर्थन में युवाओं का हुजूम देख कर दिल्ली का सुर बदला-बदला लगा। आगे देखते हैं क्या होता है।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

19 टिप्पणियाँ to “अन्ना हजारे-शत्रुकीट-धीमा नेट एवं बरसाती यात्रा —- ललित शर्मा”

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ७:०३ पूर्वाह्न 
अनेक नई जानकारी के साथ सराहनीय लेख , आभार .

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ७:४९ पूर्वाह्न 
सभी चीजों का मिश्रण कर तैयार किया गया एक अनुपम लेख ….आपकी लेखकीय क्षमता को जय हिंद …!

S.M.HABIB ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ९:०२ पूर्वाह्न 
पाली से कभी चतुरगढ जाने का मन है….
बढ़िया जघा हवे, खच्चित जाबे उंहा घुमे बर…

वाह! बढ़िया काकटेल असन हवे पोस्ट हर, बड अकन स्वाद हवे…
सादर…

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ९:१५ पूर्वाह्न 
शीघ्र लौटे पटरी पर सब और गति वापस आए, शुभकामनाएं.

Udan Tashtari ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ९:२५ पूर्वाह्न 
बहुत गजब की पोस्टं…..जबरदस्त!!

Murari Pareek ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ९:२८ पूर्वाह्न 
वाह भाई आनंद आ गया !! करीली की सब्जी और हैजा आज पहली बार सूना | सारा वृतांत मजे और चटखारे ले ले कर लिखा है | हर शब्द में आनंद आया! “शत्रु कीट” उम्दा नामकरण किया हिंदी शब्द कोष को एक नया शब्द मिला !! ऐसे ही लिखते रहे | शुभ कामनाये|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ १०:५३ पूर्वाह्न 
फूट का नाम हैजा पहली बार जाना … और करील के बारे में भी नयी जानकारी … यात्रा से ले कर अन्ना हजारे तक बढ़िया पोस्ट

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ११:२३ पूर्वाह्न 
फ़ुट – बहुत दिन बाद याद दिलाया …… यहाँ दिल्ली में नहीं मिलता..

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ११:३८ पूर्वाह्न 
पोस्‍ट कहीं से शुरू हुई और कहीं अंत .. पर तालमेल बना ही रहा सबका आपस में …
देशी फल करील के बारे मे महाकवि सूरदास ने भी लिखा है ..
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल खावै।
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै!!

पर हमारे देशवासियों ने इस बेस्‍वाद करील को भी नहीं छोडा .. तेल मसालों से स्‍वादिष्‍ट बनाकर इसका भी उपयोग किया जाता है !!

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ २:३१ अपराह्न 
छत्तीसगढ़ के बारे में नक्सल समस्या से ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं कही , आपके ब्लॉग पर इससे सम्बंधित नयी जानकारी मिल जाती है …
मोटा होना स्मार्ट होना है , नयी जानकारी …
दिलचस्प पोस्ट !

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ३:५६ अपराह्न 
यात्रा भी, जानकारी भी, मनोरंजन भी और साथ में अन्ना हजारे का साथ बहुत बढ़िया पोस्ट…

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ४:३४ अपराह्न 
यात्रा वो भी रेल की, बहुत अच्छे।

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ८:१७ अपराह्न 
बरसात में ज़रा संभल के घूमा करो भाई ।
शत्रुकीट हवा में भी घूमते हैं ।
शुभकामनायें ।

कलील की सब्जी –पहली बार सुनी ।

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ८:१८ अपराह्न 
मांफ कीजियेगा –करील पढ़ें ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ९:३७ अपराह्न 
इन्द्रधनुषी घटनाक्रम।

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ १०:०० अपराह्न 
जबरजस्त और रोचक पोस्ट।

नारायण भूषणिया ने कहा… 

on 

 १८ अगस्त २०११ ११:३८ अपराह्न 
बहुत बढ़िया पोस्ट, आपके ससुराल और हमारे जन्मस्थान का नाम ही पढकर मन रोमांचित हो जाता है.हर अक्षर के साथ बड़े आ की मात्रा.भ में बड़े आ की मात्रा भा, ट में बड़े आ की मात्रा टा, प में बड़े आ की मात्रा पा, र में बड़े आ की मात्रा रा, भाटापारा. ऐसा है कोई शहर जिसके हर अक्षर में आ की मात्रा हो ढुंढते रह जाओगे भाई साहब ससुराल जो आपका है. नारायण भूषणिया

SHAKUNTALA ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १०:५५ अपराह्न 
लालित भाई बस्तर में करील का नाम basta नहीं बल्कि बांस्ता होता है और फुट भी बस्तर या कहें पूरे छत्तीसगढ़ में ही में होता है जिसकी सब्जी बनाकर खाई जाती है

एक स्वतन्त्र नागरिक ने कहा… 

on 

 २७ अगस्त २०११ ११:२० अपराह्न 
बहुत ही सजीव और रोचक चित्रण किया है.
यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
अन्ना हजारे के बहाने …… आत्म मंथन

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_17.html

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अगस्त 30, 2011 at 3:24 अपराह्न टिप्पणी करे

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

ब्लॉ.ललित शर्मा, रविवार, १४ अगस्त २०११

 

हम स्वतन्त्र हैं…………….?

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें…………
NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

31 टिप्पणियाँ to “स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ————- ललित शर्मा”

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ११:१४ अपराह्न 
सब कुछ समझा दिया गुरु …..!

दीपक डुडेजा ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ११:४७ अपराह्न 
फिर भी हम स्वतंत्र है …

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ११:५८ अपराह्न 
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें और बधाई

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ११:५९ अपराह्न 
आपको भी स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ११:५९ अपराह्न 
स्वतंत्रता दिवस 2011 की आप सबको बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं !

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ १२:०१ पूर्वाह्न 
स्वतंत्रता दिवस 2011 की आप सबको बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं !

15th August 2011

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ १२:०६ पूर्वाह्न 
सही है …

हम ऐसे ही स्‍वतंत्र हैं !!

दीपक डुडेजा ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ १२:०७ पूर्वाह्न 
jis desh me ped sankal se bandhe jate hon
vaha svatantrata ki bat bemani hai

चैतन्य शर्मा ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ १:३८ पूर्वाह्न 
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें ..जय हिंद

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ३:१३ पूर्वाह्न 
वाह ! ललित भाई, क्या सटीक निशाना साधा है ।
फिर भी…….स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ५:३९ पूर्वाह्न 
हूँ….. 😦 हम स्वतंत्र हैं…..

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ५:५२ पूर्वाह्न 
बढि़या फ्रेम, प्रभावी चित्र.

अरूण साथी ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ७:०० पूर्वाह्न 
‘‘ये मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी’’

‘‘स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं…’’

आशा ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ७:३० पूर्वाह्न 
बहुत सुन्दर चित्र |सच है हम स्वतंत्र हो कर भी परतंत्र हैं |
स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं |
आशा

Ojaswi Kaushal ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ७:४६ पूर्वाह्न 
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वाणी गीत ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ८:०२ पूर्वाह्न 
चित्र ने भावनाओ को अभिव्यक्त किया …
जितनी भी स्वतंत्रता है , उसकी बधाई!

हेमन्‍त वैष्‍णव ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ८:१४ पूर्वाह्न 
दिल में रखकर हाथ कहिए देश क्‍या आजाद है ????

जय हिंद……

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ८:३५ पूर्वाह्न 
बस ऐसी ही स्‍वतंत्रता है .. आपके इस सुंदर सी प्रस्‍तुति से हमारी वार्ता भी समृद्ध हुई है !!

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ८:४८ पूर्वाह्न 
स्वतंत्र तो हम हैं ही ।
बच्चे पैदा करने के लिए — रिश्वत लेने के लिए –स्विस बैंकों में पैसा जमा करने के लिए –भृष्ट लोगों को बचने के लिए ।

ऐसी आज़ादी और कहाँ ?
जयहिंद ।

ajit gupta ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ८:५९ पूर्वाह्न 
एकेन्द्रिय प्राणी भी बंधन में है तो हम पंचेन्द्रिय प्राणियों को तो समझना ही चाहिए कि हम क्‍या है? लेकिन जितने भ्रष्‍टाचारी है वे स्‍वतंत्र हैं।

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ९:०४ पूर्वाह्न 
हम सचमुच स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता के सही मायने आज के परिवेश मे बंया करती तस्वीर्…… आपको भी स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाई……जय जोहार्……॥

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ९:०९ पूर्वाह्न 
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
HAPPY INDEPENDENCE DAY!

Surendra Singh Bhamboo ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ९:५७ पूर्वाह्न 
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
HAPPY INDEPENDENCE DAY!

ताऊ रामपुरिया ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ११:३१ पूर्वाह्न 
भाई इब्बी तेरी मजाक करण की आदत ना गई?

स्वतंत्रता दिवस की घणी रामराम.

रामराम.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ १२:०४ अपराह्न 
अंग्रेजों से ‘छुटकारा दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएं।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ १:४८ अपराह्न 
बिम्ब और ही कुछ कह रहा है।

S.M.HABIB ने कहा… 

on 

 १५ अगस्त २०११ ९:५९ अपराह्न 
गंभीर संकेत…
राष्ट्र पर्व की सादर बधाइयां…

दर्शन कौर’ दर्शी ‘ ने कहा… 

on 

 १६ अगस्त २०११ ८:५० पूर्वाह्न 
क्या यह आजादी कम हैं की हम अपने विचार सब तक पहुंचा देते हैं ..? अपना हर काम स्वतंत्रता से कर लेते हैं ? पर कुछ सालो बाद शायद हमारी आने वाली पीढ़ी को यह आजादी भी मय्सर नही होगी ? प्रयास अभी से करने चाहिए ???

anu ने कहा… 

on 

 १६ अगस्त २०११ ९:०७ पूर्वाह्न 
हम ऐसे ही आज़ाद है ….बेड़ियों में मिली आज़ादी …….बहुत ही खूब …सिर्फ चित्र के माध्यम से कितना कुछ समझा दिया आपने भाई जी

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 १६ अगस्त २०११ ११:५६ पूर्वाह्न 
अब वह अंग्रेजो की गुलाम नहीं रही,
खुद अपनों की बनाई जंजीरों में जकड़ी जा रही है…

फिर भी…….स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा… 

on 

 १७ अगस्त २०११ ४:२१ अपराह्न 
ऐसी आजादी और कहाँ मिलेगी।

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अगस्त 30, 2011 at 3:22 अपराह्न टिप्पणी करे

फ़्रेंडशिप डे और ढिंग चाक ढिंग चाक

ब्लॉ.ललित शर्मा, बुधवार, १० अगस्त २०११

 

पार्षद अमित दास एवं ब्लॉ. ललित शर्मा
फ़्रेंडशिप डे रविवार को मनाया गया। इसी दिन ज्वेल प्रकाश के कम्पयुटर इन्स्ट्युट का सालाना जलसा था। रायपुर शहर के संतोषीनगर दुर्गापारा में फ़ेथ कम्पयुटर इन्स्टयूट के नाम से संस्था चलाते हैं जिसमें इग्नु के कोर्स चलाए जाते हैं। वार्षिकोत्सव में ज्वेल ने साग्रह आमंत्रित किया था। वैसे भी सप्ताह में 3-4 कार्यक्रम के आमंत्रण रहते हैं। शैक्षणिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में मेरी उपस्थिति हमेशा रहती है। क्योंकि स्वयं को विद्यार्थी ही मानता हूँ,  जहाँ से जो सीखने मिल जाए वही अच्छा है। मनुष्य जीवन भर सीखता है और उसी सीख का प्रयोग जीवन में करता है। उदय भी मेरे साथ कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ। वार्षिकोत्सव में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन था।.
ब्लॉ. ललित शर्मा
संतोषीनगर के पार्षद अमित दास कार्यक्रम में मुख्यातिथि थे। गुब्बारों एवं फ़ूलों से सुसज्जित इन्स्टीट्युट में हमारे पहुंचते ही कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। संचालक एवं विद्यार्थियों इन्स्टीट्युट की सालाना गतिविधियों पर प्रकाश डाला। अतिथियों के स्वागत के पश्चात  रिकार्डिंग पर डांस प्रारंभ हुआ। उदय भी चलती गाड़ी पर सवार हो गए और “ढिंग चाक ढिंग चाक” गाने पर डांस किया। इस अवसर पर अमित दास, ज्वेल प्रकाश, ज्योति प्रकाश, रघुवंशी एवं मैने अपने विचार प्रगट किए। तदुपरांत विद्यार्थियों को पुरस्कार वितरण किया गया। विद्यार्थियों में भरपुर उल्लास था, हमें भी घर आना था। इसलिए ज्वेल प्रकाश को शुभकामनाएं देकर एवं प्रस्थान की अनुमति लेकर चल पड़े घर की ओर। प्रस्तुत हैं कार्यक्रम के कुछ चित्र–

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

24 टिप्पणियाँ to “फ़्रेंडशिप डे और ढिंग चाक ढिंग चाक — ललित शर्मा”

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali ‘Rajnish’) ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ५:५३ पूर्वाह्न 
इस रंगारंग कार्यक्रम से परिचय कराने का शुक्रिया।

ललित भाई, आप तो हमेशा की तरह स्‍मार्ट ही लग रहे हैं।

——
बारात उड़ गई!
ब्‍लॉग के लिए ज़रूरी चीजें!

Archana ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ७:२० पूर्वाह्न 
he he he he ……….

S.M.HABIB ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ८:१२ पूर्वाह्न 
ढिंक चिका, ढिंक चिका, हे हे हे हे…
सलमान संग सलीम खान घलोक काबर नी नाचिस ग…
मित्रता दिवस की बधाई…

ali ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ८:४७ पूर्वाह्न 
@ पहली फोटो ,
आदमी तीन और किनले चार बहुत नाइंसाफी है 🙂

@ ढिंक चिका ,
मज़ा आ गया 🙂

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ९:२६ पूर्वाह्न 
एक मदमस्त करने वाली रिपोर्ट ……!

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ९:२८ पूर्वाह्न 
उदय जी का डांस भी गजब है …..!

Shah Nawaz ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ९:४६ पूर्वाह्न 
ali ने कहा…

@ पहली फोटो ,
आदमी तीन और किनले चार बहुत नाइंसाफी है 🙂

Kinley – बूँद-बूँद में विश्वास!

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ १:१७ अपराह्न 
हा हा हा ! ललित भाई , टेबल तो पानी पानी हो रखी है . लेकिन आप स्मार्ट लग रहे हैं . बढ़िया है .

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ १:५७ अपराह्न 
badiya

anu ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ २:०४ अपराह्न 
रंगारंग कार्यक्रम से परिचय कराने का शुक्रिया ….भाई जी

बच्चे (उदय )डांस भी अच्छा लगा …..

Arunesh c dave ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ २:१९ अपराह्न 
जय हो

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ २:५७ अपराह्न 
बहुत अच्छी प्रस्तुति…आयो़जन में शामिल होने जैसा लगा…

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ६:३७ अपराह्न 
अच्छी प्रस्तुति…सुन्दर आयो़जन…

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ७:०८ अपराह्न 
गोधूली बेला पर मित्र-मिलन समारोह या मित्रता दिवस पर आपकी सशरीर उपस्थिति के कारण प्रतिभागियों के उत्साह को चर्मोत्कर्ष तक संचरण करने क लिए उचित वातवरण की उपलब्धि हुई होगी।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ९:३६ अपराह्न 
मित्रता का उत्साह बढ़ाता यह कार्यक्रम।

ताऊ रामपुरिया ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ९:४३ अपराह्न 
इस रंगारंग कार्यक्रम से रूबरू कराने के लिये आभार.

रामराम.

मदन शर्मा ने कहा… 

on 

 ११ अगस्त २०११ १:१० पूर्वाह्न 
इस रंगारंग कार्यक्रम से परिचय कराने का शुक्रिया।
मेरा आपसे निवेदन है कि 16 अगस्त से आप एक हफ्ता देश के नाम करें, अन्ना के आमरण अनशन के शुरू होने के साथ ही आप भी अनशन करें, सड़कों पर उतरें। अपने घर के सामने बैठ जाइए या फिर किसी चौराहे या पार्क में तिरंगा लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाइए। इस बार चूके तो फिर पता नहीं कि यह मौका दोबारा कब आए।

vidhya ने कहा… 

on 

 ११ अगस्त २०११ ४:३७ अपराह्न 
अच्छी प्रस्तुति…सुन्दर आयो़जन…

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 ११ अगस्त २०११ ११:५० अपराह्न 
अच्छा कार्यक्रम , उदय का नृत्य क्या कहने

रेखा ने कहा… 

on 

 १२ अगस्त २०११ ३:२० अपराह्न 
इस रंगारंग कार्यक्रम से अवगत करने के लिए आभार ..

Faith ने कहा… 

on 

 १२ अगस्त २०११ ९:४२ अपराह्न 
Thank u sir Mere Institution ke 6th celebration or Friendship day ke bare me Likhne ke liye hamare ak hi sapna he (Our vision & Mission Quality in Education)
again Thank u.

सतीश सक्सेना ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ७:१३ पूर्वाह्न 
@बढ़िया प्रस्तुति ललित भाई …
छा गए हो ! शुभकामनायें आपको !

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ९:०४ पूर्वाह्न 
हमारे कंप्यूटर को क्या हो गया है पता नही। आवाज गायब। हम भी सुने होते “ढिंग चाक ढिंग चाक”………अच्छी प्रस्तुति।

Mrs. Asha Joglekar ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ १०:२० अपराह्न 
एक कामयाब मित्रता दिवस समारोह. बच्चे का नृत्य जोरदार.

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_10.html

अगस्त 30, 2011 at 3:20 अपराह्न टिप्पणी करे

फ़र्जी डॉक्टरों से बचके रे बाबा

ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, ८ अगस्त २०११

 

डॉक्टर शब्द वैसे ही माननीय और सम्माननीय है जैसे किसी जमाने में वैद्य, वैद्यराज, हकीम शब्द हुआ करते थे। आज से 25 वर्ष पहले यदि कोई बीमार हो जाता था तो डॉक्टर को बुलाने पर उसका बैग (पेटी) भी उठाकर लाना पड़ता था। उसकी डिग्री कोई नहीं देखता था, बस बीमार ठीक होना चाहिए, लोग यही चाहते थे। कौन एम बी बी एस, कौन बी ए एम एस कौन आर एम पी है। इससे कोई मतलब नहीं था। हमारे गाँव का आर एम पी डॉक्टर खाट खड़ी करके उसके पाए में ग्लुकोश की बोतल लटका कर नीम के पेड़ के नीचे ही मरीज को चढा देता था। दो चार गोली और इंजेक्शन दिए फ़िर अगले गाँव को प्रस्थान कर जाता था। इन डॉक्टरों में फ़र्क ही नहीं मालूम होता था। जब हाई स्कूल में पढने लगे तब पता चला कि कितने तरह की चिकित्सा पद्धतियां हैं और कितने तरह के डॉक्टर हैं। एक ऐसा भी डॉक्टर सुना जो इलाज नहीं करता फ़िर भी डॉक्टर हैं। हम तो यही समझते थे कि जिसका भी नाम डॉक्टर वही इलाज करता है। इस नए प्रकार के डॉक्टर को पी एच डी डॉक्टर कहते हैं।

आज एक डॉक्टर बनाना इतना मंहगा हो गया है कि सिर्फ़ करोड़पति लोग ही अपने बच्चे को डॉक्टर बना सकते हैं। मेरे मित्र के बच्चे को पी एम टी में सरकारी सीट नहीं मिली तो बच्चे को उसने प्रायवेट मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलवाया। हिसाब लगाने पर पता चला कि जब वह एम बी बी एस की डिग्री लेकर कॉलेज से पास आऊट होगा तब तक उसके 32 लाख रुपए खर्च हो जाएगें। यह आंकड़ा तीन साल पहले का है। इंजीनियरिंग में बी ई करने के लिए एक सैमेस्टर का खर्च 80 हजार से 1 लाख रुपए है। सरकारी कालेजो ने भी अपनी फ़ीस बढा दी है। चिकित्सा शिक्षा एवं तकनीकि शिक्षा इतनी मंहगी हो गयी है कि आम आदमी के बस के बाहर की बात है। जबकि आज भी देश में चिकित्सकों की कमी है। ग्रामीण अंचलों में चिकित्सा सहायता रोगी को समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती और उसके प्राण चले जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीजों का कोई माई बाप नहीं है, इसीलिए लोग प्रायवेट अस्पतालों इलाज कराने को प्राथमिकता देते हैं। जिसकी परिणीति शहरों में खुले हुए बड़े बड़े नर्सिग होम हैं।

हमें अंग्रेजी के गुरु जी कहते थे कि -“डॉक्टर, इंजीनियर,वकील वर हैं, बाकी सब गोबर हैं।” कहने का मतलब था कि अच्छी पढाई करो और इन तीनों में से कुछ बन कर दिखाओ, यही सब योग्य हैं। इनकी ही समाज में प्रतिष्ठा और मान्यता है। हम हाई स्कूल में कला संकाय के विद्यार्थी बन चुके थे, इसलिए डॉक्टर और इंजीनियर बनना की संभावना ही खत्म हो गयी थी। स्कूल में इतने अधिक विषय भी नहीं थे, सिर्फ़ कला और विज्ञान संकाय ही थे, इन दोनो में से चयन करना था। इसलिए कला ही चुन लिया, खेलते कूदते पास हो जाएगें, अधिक मगजमारी नहीं करनी पड़ेगी। कालांतर में डॉक्टर एक जाति ही बन गयी। समाज उच्च शिक्षित एवं प्रतिष्ठित वर्ग तैयार हो गया। बड़े लोग इनके रहन-सहन एवं पहनने ओढने की नकल करते हैं। आज भी लोग अपने बच्चे को सबसे पहले डॉक्टर ही बनाना चाहते हैं। जिनके परिवार में एक एम बी बी एस डॉक्टर हो गया, उसका समाज में रुतबा बढ जाता है।

इस रुतबे को बनाने के लिए पी एच डी का चलन बढ गया। किसी एक विषय या पक्ष को लेकर शोध करने पर पी एच डी डॉक्टर की उपाधि प्रदान की जाती है। पी एच डी रजिस्ट्रेशन से लेकर गाईड ढूंढ कर शोध करना भी एक कठिन कार्य है। गाईड के यहां पानी भरने, उसके बच्चे खिलाने, बाजार से सब्जी लाने, से लेकर समय-समय पर धन-धान्य की दक्षिणा देकर डिग्री पाने तक शोधार्थी का खून सूख जाता है। सदा ध्यान रखना पड़ता है कि कब गाईड का जन्म दिन है, कब उसके बच्चे-बीबी का जन्मदिन है, कब उसकी वैवाहिक वर्षगांठ है, कब उसकी गाय  ने गाँव में बछिया जनी है, कब उसके पिताजी-माताजी की पुण्य तिथि है, कब उसे कहां सम्मानित किया जा रहा है। यह सब याद रखने का तात्पर्य है कि ध्यान रहे कौन सा अवसर भेंट पूजा देने का है। कोई अवसर नहीं चूकना चाहिए, अन्यथा आपकी डिग्री का समय उतना ही बढता जाएगा और आपकी उम्र उतनी ही घटती जाएगी। बताईए एक डॉक्टर की उपाधि के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं।

मेरे साथ के कई लड़के कला संकाय में पढने के बाद अभी गाँव में डॉक्टरी कर रहे हैं। अच्छे नोट छाप रहे हैं। एक दिन मुझे बरसों के बाद सहपाठी पुष्पकुमार मिल गया। मैने उससे पूछा लिया क्या काम कर रहा है? उसने बताया कि वह डॉक्टरी कर रहा है। उसने मोटर सायकिल पर रेडक्रास बनाकर अपना नाम भी लिख रखा था डॉक्टर पुष्पकुमार साहू। मैने उससे पूछा कि डॉक्टरी कब पढ लिया? तो उसने बताया कि वह एक नर्स से शादी करके डॉक्टर हो गया। नर्स से ही कुछ दवाईयों का नाम एवं इंजेक्शन लगाना सीख लिया। वैद्य-विशारद और आयुर्वेद रत्न का सर्टिफ़िकेट जुगाड़ किया और जिस गाँव में नर्स पदस्थ थी वही डिस्पेंसरी खोल ली। धड़ल्ले से डॉक्टर बना घूम रहा है। 32 लाख खर्च करके डॉक्टर बनने की बजाए नर्स से शादी करके डॉक्टर बनने का जुगाड़ सरल और सीधा लगा। सम्बलपुर में एक डॉक्टर की डिग्री देख कर ही दंग रह गया। बरसात के कारण कुछ देर के लिए उसके क्लिनिक में रुकना पड़ा। उसके साईन बोर्ड पे लिखा था डॉक्टर फ़लाँ फ़लाँ बीए, एम ए, एम बी बी एस, एफ़ आई सी आर एम पी। मैने डिग्री के विषय में उससे बात ही नहीं की क्योंकि बारिश में शरण जो ले रखी थी।

नाम के साथ डॉक्टर लिखने के लिए चिकित्सा विज्ञान की 5 साल की पढाई करनी पड़ती है, या शोध करना पड़ता है। लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। तब कहीं जाकर डॉक्टर लिखने की पात्रता हासिल होती है। कोई भी ऐरा-गैरा नीम हकीम फ़र्जी सर्टिफ़िकेट लेकर अपने नाम के साथ डॉक्टर लिखने लग जाता है। जगह-जगह चांदसी दवाखाने खुले हुए हैं, शासन की उदासीनता के कारण लोगों के हौसले बढते जा रहे हैं। नए नए कोर्स पैदा हो रहे हैं, इलेक्ट्रोहोम्योपैथी नामक नयी चिकित्सा पद्धति के प्रास्पेक्टस पर मैने लिखा देखा “कोर्ट से मान्यता प्राप्त”। सोचता रहा कि कोर्ट कब से मेडिकल कौंसिल का काम करने लग गए। इसमें एडमिशन लेने पर 7 हजार (शायद फ़ीस बढ गयी हो) में बी ए एम एस (इलेक्ट्रोहोमियोपैथी) की डिग्री मिलने बाद एलोपैथी चिकित्सा शुरु हो जाती है। सरकार के कानूनों का खुले आम मखौल उड़ाया जा रहा है। नकली डॉक्टरों के द्वारा ठगी करने के मामले अखबारों में पढने मिलते रहते हैं। मरीज को बिना बताए दारु छुड़वाएं, इत्यादि इत्यादि। अखबारों में विज्ञापन देकर ग्राहक फ़ंसाने का कारोबार बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसलिए फ़र्जी डिग्रीधारी डॉक्टरों से बचकर रहने में ही समझदारी है। कहीं जान के लाले न पड़ जाएं। नाम के साथ डॉ लिखने का उपयुक्त कारण न पाए  जाने पर इन्हे जेल भेजा जाना चाहिए।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

29 टिप्पणियाँ to “फ़र्जी डॉक्टरों से बचके रे बाबा —- ललित शर्मा”

महेन्द्र मिश्र ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ५:३८ पूर्वाह्न 
बच के रहना रे बाबा बच के रहना रे झोलाछाप डाक्टरों से … बिलकुल सही …

सतीश सक्सेना ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ५:५३ पूर्वाह्न 
“32 लाख खर्च करके डॉक्टर बनने की बजाए नर्स से शादी करके डॉक्टर बनने का जुगाड़ सरल और सीधा लगा।”

यह जुगाड़ पसंद आया ललित भाई !
शुभकामनाएं !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ६:२५ पूर्वाह्न 
यह धन्धा उफान पर है।

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ६:२८ पूर्वाह्न 
जुगाड़ कैसे- कैसे !
फर्जी ब्लॉगर्स पर भी प्रकाश डाला जाए किसी पोस्ट में !

पत्रकार-अख्तर खान “अकेला” ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:१६ पूर्वाह्न 
bhaai jo orignal chikitsak hote hain or keval 2 pretishat vaale aarkshan ke chikitsak hote hain unse bhi to mot hi milti hai bahtrin chintan hai bhaijaan lekin ho kahaan in dinon ……akhtar khan akela kota rajsthan

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:२७ पूर्वाह्न 
अब तो मेडिकल कालेजें डाक्टर नहीं कसाई पैदा कर रही है|
way4host

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:५४ पूर्वाह्न 
सही फरमाया.

भारतीय नागरिक – Indian Citizen ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ८:२७ पूर्वाह्न 
garib ke liye to yahi mil sakte hain..

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ८:३१ पूर्वाह्न 
सच में सतर्क रहना ज़रूरी है….

Arunesh c dave ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ९:५४ पूर्वाह्न 
अरे भाई अपना तो प्रधानमंतरी भी फ़र्जी डाक्टर निकला । ज्यों ज्यों दवा दी मर्ज बढ़ता गया।

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ १०:४२ पूर्वाह्न 
एक अच्छी अपील ….यह तो वही जानता है जो डॉ बनता है ….लेकिन जो नाम का डॉ है उसका क्या कहना ……अब हमें भी नर्स की तलाश करनी पड़ेगी ….हा..हा…हा..!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ११:२८ पूर्वाह्न 
जागरूक करने वाली पोस्ट … नकली डॉक्टर से बचना ज़रूरी …नर्स से शादी कर डॉक्टर बनते पहली बार जाना ..

vidhya ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ११:५३ पूर्वाह्न 
सच में सतर्क रहना ज़रूरी है….

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ २:२१ अपराह्न 
नकली डॉक्‍टरों से बचना जरूरी है .. वैसे अगली पोस्‍ट में ज्‍योतिषियों का नंबर तो नहीं है ??

arvind ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:०३ अपराह्न 
vaise aapne dr. banane ke achhe-achhe jugaar bataaye hain..lekin saavdhaan rahane ki jarurat hai aise dr helth our samaaj dono ke liye khataranaak hain…ab to certificat dekh ke hi yakin karunga ..nahi to pata nahi kitane log…blogger friends bhi dr banake ghoom rahe hain. jo sach me kabil dr ya phd hain unpe kyaa beet rahi hogee ye sochne kee baat hai……ek baat to tay hai ki naam ke pahle dr lagaanevalo ki sankhya kaafi badh gayee hai our mahatv lkam ho gayaa hai.

S.M.HABIB ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:१८ अपराह्न 
एक चिंतनीय आलेख…
सादर…

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:२९ अपराह्न 
सार्थक चर्चा के लिए हार्दिक बधाई।

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:५१ अपराह्न 
एक नर्स से शादी करके डॉक्टर हो गया।
हा हा हा ! यह भी खूब रही . अभी तक तो यही सुना था की डॉक्टर की पत्नी doktarni .

नकली डॉक्टर्स से तो सावधान रहना ही चाहिए . आखिर जान माल का मामला है .

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ४:३१ अपराह्न 
जागरूक करने वाली पोस्ट … ऐसे डॉक्टरों से बचकर रहने में ही समझदारी है…

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ५:०९ अपराह्न 
एक नर्स से शादी करके डॉक्टर हो गया।

क्या दिकत है यार……
पत्नी सरपंच बनी…. पति सरपंच हो गया…
पत्नी पञ्च बनी…… श्रीमान जी पञ्च हो गए….
पत्नी मास्टरनी बनी ……….. श्रीमान जी मास्टरजी हो गए…..

यही भारत है मेरी जान .

ताऊ रामपुरिया ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:१३ अपराह्न 
इस महंगी शिक्षा के युग में यह जोगाड बताने के लिये ब्लाग संसद, आपका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने की सिफ़ारिश करेगी, अगले सत्र में यह प्रस्ताव रखा जायेगा.

रामराम.

हेमन्‍त वैष्‍णव ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ ८:१० पूर्वाह्न 
डॉक्टर फ़लाँ फ़लाँ बीए, एम ए, एम बी बी एस, एफ़ आई सी आर एम पी।
डॉक्टर के उम्र के अंदाजा लगावत हवं ☺

ajit gupta ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ ८:३४ पूर्वाह्न 
इस देश में जितने भी शोधार्थी है उन्‍हें आपके बताए नुस्‍खे काम में लेने ही पड़ते हैं। बहुत अच्‍छी पोस्‍ट है, बधाई।

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ १०:३३ पूर्वाह्न 
क्या बात है. महराज हमने एक पोस्ट डाला था अभियांत्रिकी निकाय की अपेक्षा चिकित्सा निकाय कि ओर रुझान कम क्यों.
उसी का विश्लेषणात्मक रूप पढने को मिला. सुन्दर आकर्षक ढंग से लिखा हुआ. आज आदमी क्या करे समझ नहीं आता
बड़े बड़े डिग्री धारी भी पहले तमाम टेस्ट करवाओ बोलते हैं फिर इलाज करते हैं. गाँव में तो एक डिग्री याद आती है
व्ही व्ही एस आर एम पी आर एस यू (वैद्य विशारद रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर रविशंकर यूनिवर्सिटी)….शानदार लेख…बधाई

मनोज कुमार ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ २:०३ अपराह्न 
समाज की सच्चाई को उकेरा है आपने।

ब्रह्मचारी अनंतबोध चैतन्य ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ २:२२ अपराह्न 
सत्यं सत्यं वदन्तु भवन्तः ।

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ ३:५७ अपराह्न 
अब क्‍या बचें
हम तो फंस गए
http://avinash.nukkadh.com/2011/08/blog-post.html
तोते थे नहीं अपने पास
फिर भी सारे उड़ गए

Vijay Kumar Sappatti ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ५:१२ अपराह्न 
aapne sahi kaha lalit ji .. aajkal doctory padhaana bhi sirf karodpatiyo ka hi kaam rah gaya hai …. aur jhola chaap doctaro ki wajah se jaane kitne saari maute hoti hai ….

aapka lekh bahut saarthak aur samay ke anuroop hai ..

badhayi

डॉ महेश सिन्हा ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ९:५२ अपराह्न 
इन साठ सालों में सरकार ने किया क्या है जो उससे कोई उम्मीद रखी जाये।
सार्थक पोस्ट

अगस्त 30, 2011 at 3:18 अपराह्न टिप्पणी करे

मिस्टर टेटकू राम! स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन

ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, ६ अगस्त २०११

 

छत्तीसगढी फ़िल्म उद्योग छालीवुड के नाम से पहचाना जाता है, छालीवुड नाम की पहचान बनाने में “मोर छंइया भुंईया” नामक फ़िल्म की महती भूमिका है। नए राज्य छत्तीसगढ के निर्माण के साथ ही इस फ़िल्म का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ और इसने सफ़लता के झंडे गाड़ दिए। इस फ़िल्म ने अनुज शर्मा की मुख्य अभिनेता के रुप में पहचान बनाई। फ़िल्म के निर्देशक सतीश जैन थे, फ़िल्म के गीत भी कर्णप्रिय थे। इस फ़िल्म की सफ़लता के पश्चात छालीवुड में फ़िल्म निर्माण का सिलसिला प्रारंभ हो गया। मनु नायक की “कहि देबे संदेश” जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म की असफ़लता के पश्चात छत्तीसगढी भाषा की फ़िल्मे एक लम्बे समय से बनना ही बंद हो गयी थी। मृतप्राय सी छत्तीसगढी फ़िल्मकारों की आशाओं को “मोर छंइया भुंईया” ने एकाएक जगा दिया। सन 2000 से लेकर 2010 तक छालीवुड ने एक लम्बा सफ़र तय किया। फ़िल्म निर्माण की तरफ़ लोगों का ध्यान खींचा एवं टाकीजों से मुंह मोड़ चुके दर्शक पुन: फ़िल्म देखने के लिए टाकीजों की तरफ़ चल पड़े।
फ़िल्म  का एक सीन
छालीवुड में बाक्स ऑफ़िस पर भीड़ जुटाने छत्तीसगढी फ़िल्में कामयाब रही। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का भरपुर मौका मिला। रंगमंच से जुड़े कलाकार भी सुनहले पर्दे पर दिखाई देने लगे। उनकी भी पूछ परख होने लगी। दस वर्ष के सफ़र के पश्चात छालीवुड में फ़्लाप फ़िल्में आने लगी। लगा कि गाड़ी पटरी से उतर रही है। इसी दौरान अनुज शर्मा ने अभिनय के साथ फ़िल्म निर्माण का फ़ैसला लिया और मनोज वर्मा के निर्देशन में महत्वाकांक्षी फ़िल्म मिस्टर टेटकूराम बना डाली। इस फ़िल्म के कुछ गानों की शुटिंग प्रदेश से बाहर जाकर हिमाचल की सुरम्य वादियों में की। शायद यह पहला मौका था जब छत्तीसगढी कलाकार प्रदेश के बाहर जाकर किसी  अन्य लोकेशन पर फ़िल्म की शुटिंग कर रहे थे। इसकी सूचना कुछ मित्रों से मिली थी। मिस्टर टेटकू राम का प्रीमियर शो 5 अगस्त को प्रभात टाकीज में हुआ। प्रीमियर शो देख कर निकले दर्शकों ने फ़िल्म की भूरि-भुरि प्रशंसा की।
पुष्पेन्द्र सिंह (फ़त्ते) और ललित शर्मा
इस फ़िल्म की प्यार एवं हास्य मिश्रित पटकथा अच्छी बन पड़ी है। फ़िल्म में अनुज शर्मा ने टेटकू राम, पुष्पेंद्र सिंह ने मकान मालिक फ़त्ते, पूजा साहू ने टुनकी, शिवकुमार दीपक ने दादा, हेमलाल कौशल ने टॉमी, संजय महानंद ने गुग्गी, आशीष शेंद्रे ने टेटकू राम के पिता की भूमिका निभाई है। फ़िल्म की कहानी मकान, मकान मालिक एवं किराएदारों के ईर्द-गिर्द ही घूमती है। फ़त्ते के मकान में कुछ किराएदार रहते हैं, जिसमें टेट्कूराम नगर निगम में अधिकारी के पद पर कार्यरत है, इसे एक रेड़ियो जॉकी की आवाज इतनी मधूर लगती है कि आवाज सुनकर उससे प्यार पींगे बढाने लगता है, फ़त्ते की लड़की अपने बाप से छिपकर रेड़ियो जॉकी का काम करती है। गाजा बजाना फ़त्ते को पसंद नहीं है, इसकी बड़ी लड़की ने एक तबला वादक से विवाह कर लिया, तब से फ़त्ते उससे नाराज होकर संबंध तोड़ चुका है। टुनकी अपने पिता के सगीत विरोधी होने के कारण उसे स्कूल में काम करना बताती है। घर में रहने वाले किसी किराएदार को टुनकी के कार्य के विषय में जानकारी नहीं होती।
संजय महानंद (गुघ्गी)
फ़िल्म में छत्तीसगढ में किसानों की जमीन बिल्डरों द्वारा खरीदे जाने पर भी गहरा कटाक्ष किया है। गुघ्गी एक जमीन दलाल है और वह फ़त्ते के मकान की जमीन पर नजर गड़ाए रहता है। उसका एकमात्र ध्येय किसी तरह फ़त्ते की जमीन खरीदना रहता है, वह उसे रुपए का लालच देता है, लेकिन फ़त्ते मकान बेचना स्वीकार नहीं करता और उसे घर से भगा देता है। इसी बीच टेटकू राम की मोबाईल बातचीत रेड़ियो जॉकी से होती है। जब वह उससे नाम पूछती है तो उसे अपना नाम टेटकू राम बताने में शर्म आती है। वह नाम नहीं बताता, टॉमी की सलाह से टेटकू राम से शार्ट नेम लगा कर टी.आर.साहू हो जाता है। अपने माँ-बाप से नाम के विषय में पूछता है तो उसकी माँ बताती है कि उसके बच्चे जन्म लेने के बाद नहीं रहते थे इसलिए इस बच्चे का नाम टोटका स्वरुप टेटकू राम रख दिया। फ़त्ते और टेटकू राम का बाप टुनकी और टेटकू का रिश्ता आपस में तय कर देते हैं। जिससे टेटकू राम एवं टुनकी दोनो नकार देते हैं। क्योंकि टेट्कू नहीं जानता था कि टुनकी ही रेड़ियो जॉकी है और टुनकी नहीं जानती थी कि जिस मोबाईल कॉल वाले लड़के से प्यार की पींगे बढा रही है वह और कोई नहीं टेटकूराम ही है।
अनुज शर्मा और हेमलाल यादव
एक दिन टुनकी और टेटकू मिलकर एक दुसरे के विषय में जान जाते हैं। इसी बीच किराएदारों में शामिल दादा के पोते की तबियत खराब होने के कारण उसे अस्पताल में दाखिल कराया जाता है, तब टेटकू अपने पिता से कहके गाँव चला जाता है और फ़त्ते अपना घर गुग्गी को बेच देता है। इससे सारे किराएदार उसे लानत-मलानत भेजते हैं, भला-बुरा कहते हैं। तभी टेटकू सबको आकर बताता है कि दादा के पोते की किडनी खराब हो गयी है और उसके इलाज के लिए ही फ़त्ते ने अपना मकान बेच दिया है। वह कहता है कि उसने डाक्टर को रुपए चुका दिए हैं अब मकान बेचने की आवश्यकता नहीं है। टेटकू गाँव का मकान बेचकर बच्चे की जान बचाने का संवेदनात्मक मानवीय पक्ष उजागर करता है। गुग्गी को रुपए वापस कर देते हैं तो उसे यह नागवार गुजरता है। इसके बाद फ़िल्म बंबईया मसाला फ़िल्मों जैसे क्लाईमैक्स की ओर बढ जाती है। अंत में ढिसुम-ढिसुम के पश्चात फ़त्ते अपनी लड़की टुनकी का हाथ टेटकू राम के हाथ में दे देता है। फ़िल्म अपनी गति की ओर बढ जाती है।
पूजा साहू
जहाँ अनुज शर्मा के अभिनय में परिपक्वता है, वहाँ फ़त्ते के रुप में पुष्पेंद्र सिंह का सशक्त अभिनय है, संवाद के साथ चेहरे के हाव-भाव मेल खाते हैं, इनके अभिनय में रंगमंच के मंजे हुए कलाकार की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। नायिका की दोहरी भूमिका में पूजा साहू का अभिनय ठीक रहा। टामी का पात्र निभाने वाले हेमलाल कौशल का प्ले मैने देखा था, उस दिन लगा था कि इसका चेहरा-मोहरा राजपाल यादव से मिलता जुलता है। वैसी भूमिका इसने फ़िल्म में भी निभाई है।  गुग्गी के रुप में संजय महानंद ने पंजाबी भाषा का छत्तीसगढी के साथ मिश्रण करके उम्दा हास्य संवाद प्रस्तुत किया। शिव कुमार दीपक ने वृद्ध दादा की भूमिका अच्छे से निभाई। उपासना वैष्णव एवं बाल कलाकर आयुष का भी प्रदर्शन बेहतरीन रहा। आशीष शेंद्रे ने भी टेटकूराम के पिता की भूमिका में कोई कसर नहीं छोड़ी। फ़िल्म निर्देशन भी अच्छा है।फ़िल्म में टायटिल सांग प्रयोग किया गया है।
पुष्पेन्द्र सिंह फ़त्ते की भू्मिका में
सुनील सोनी के संगीत के साथ मशहूर छत्तीसगढी गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया एवं कुबेर गीतपरिहा ने.गीत लिखे हैं, गीतों को स्वर सुनील सोनी, अलका चंद्राकर, विजया राऊत एवं अनुज शर्मा ने दिया तथा फ़िल्मांकन दिनेश ठक्कर ने किया है। कुछ गीत धूम मचा सकते हैं। कुल मिलाकर फ़िल्म में वह सब मसाला है जिससे फ़िल्म चला करती है। चुटीले हास्य के साथ प्रेम कहानी का उम्दा प्रयोग किया है। स्वस्थ मनोरंजन से भरपुर परिवार के साथ बैठकर देखने लायक फ़िल्म है। आशा है मिस्टर टेटकूराम एक सफ़ल फ़िल्म साबित होगी तथा 2011 में मील का पत्थर बनकर छालीवुड को फ़्लाप फ़िल्मों के दौर से बाहर लेकर आएगी।  भरपुर हास्य का मजा लेना है तो एक फ़िल्म देखें। अभ्युदय इंटरटेनमेंट एवं शर्मा एवं वर्मा की समस्त टीम की हार्दिक शुभकामनाएं। फ़िल्म का प्रोमो यहाँ पर देखें

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

23 टिप्पणियाँ to “मिस्टर टेटकू राम! स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन — ललित शर्मा”

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ६:२६ पूर्वाह्न 
वाह जी ! बढ़िया लगी फिल्म समीक्षा |
way4host

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ७:१४ पूर्वाह्न 
फिल्‍म की पटकथा अच्‍छी लगी .. आपने बढिया विश्‍लेषण भी किया है .. अभ्युदय इंटरटेनमेंट सहित फिल्‍म्‍ की समस्त टीम को हार्दिक शुभकामनाएं !!

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:०३ पूर्वाह्न 
चित्रों से लापतागंज जैसा माहौल नजर आ रहा है …
रोचक समीक्षा !

Udan Tashtari ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:३४ पूर्वाह्न 
रोचक!!

हेमन्‍त वैष्‍णव ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:५२ पूर्वाह्न 
सिनेमा के बारे में सोचना और बनाना, दो अलग-अलग काम है। ज्या दातर लोग पहला वाला काम करते हैं। मिस्टर टेटकू राम के निर्देशक मनोज वर्मा जी सोचने और करने के फासले को मिटा दिए। छत्तीसगढ़ के लोककलाकारों को शुरू से अन्त तक सिनेमाई अनुशासन में बांधकर बेहतर अभिनय कराने में कामयाबी बेहतर निर्देशक साबित हुए । फत्ते की भूमिका में पूरे फिल्म के अन्त तक किरदार को ना पहचान पाना खुद के लिए जीवन्त अभिनय की अनूठी मिसाल साबित हूए पुष्पेन्द्र् जी , बगैर बिखराव पूरे फिल्म में दर्शको को बांधकर रखने जो निरन्तरता होनी चाहिए वो दिखे इस फिल्म में, ध्वन्याकन में छत्तीसगढि़या लहजा ध्यान में रखा जाना प्रंशसनीय है जो कई फिल्मो में चुक गया है । बर्फीली वादियो में छत्तीसगढ़ी गीतो का देखना सुनना भाता है वही संवाद और दृश्य में मिटटी की खूशबु है अंत में ढिसुम-ढिसुम की अवधि थोड़ा कम होना था ।
चलते चलते हास्य बोध–6 मंजिला मिलेट्री हेडक्वाटर में आग लग जाती है, ब्रिगेडियर के आदेश से आनन फ़ानन में बिल्डिंग के बाहर जाल तान कर सिपाही खड़े हो जाते है, छत से फ़ौजी जाल में कूदना प्रारंभ करते हैं। सिपाही से लेकर हवलदार तक सब कूद जाते हैं और उनकी जान बच जाती है। जैसे ही ब्रिग्रेडियर साहब सावधान करके बिल्डिंग से छलांग लगाते हैं वैसे ही जाल पकड़ने वाले सिपाही, जाल छोड़ कर उन्हे सैल्युट दे देते हैं। जैसे पीछे की पंक्ति से आता हुआ समोसा पहली पंक्ति तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देता है दुर्भाग्य से पहली पंक्ति में ललित भैया के साथ मैं विराजमान था
कुल मिलाके ए फिलिम एकदम झम हे….. मां कसम

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:५४ पूर्वाह्न 
पुराने दिनों में अपने साथियों से ईर्ष्‍या होती थी, जो फिल्‍म हमसे पहले देख ले और स्‍टोरी सुना डाले, सुनते भी थे चाव से लेकिन कोसते थे कि इसने पहले क्‍यों देख ली और हमने अब तक क्‍यों नहीं देखी.

Murari Pareek ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:३० पूर्वाह्न 
badhiyaa!! tetku raam dhamaal macha de yahi kamnaa hai!!

Raviratlami ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:४३ पूर्वाह्न 
ए फिलिम ल त देखे ल पड़ही लगथे ददा. एखर डीवीडी जारी हो गे हे का? काबर कि ए तरफ त ये फिलिम रिलीज नइ होही…

SHAKUNTALA ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:४७ पूर्वाह्न 
मैंने समीक्षा लगातार दो बार पढ़ ली अनुज वास्तव में प्रतिभाशाली कलाकार है .समीक्षा पढ़कर मन में उत्कंठा है की कब मैं यह फ़िल्म देखने जाऊं

महेन्द्र मिश्र ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ १२:२७ अपराह्न 
vaah ,,anand aa gaya rochak prastuti..

रविन्‍द्र पुंज ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ १२:३६ अपराह्न 
बहुत बडिया।
लेकिन
आपके नेटवर्कड ब्‍लॉग को फोलो करने पर यह मैसेज आ रहा है:
Blog does not exist.
If you have changed the name of your blog after installing the widget, then please re-install the widget to get the updated link.
कृप्‍या अपडेट करें। धन्‍यवाद सहित।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ १:२८ अपराह्न 
महत प्रयास के लिये सभी को बधाई और शुभकामनायें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ३:१२ अपराह्न 
आपकी नज़र से देख ली यह फिल्म .. अच्छी समीक्षा

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ४:३६ अपराह्न 
अनुज बहुत अच्छे व प्रतिभाशाली कलाकार हैं… अच्छी फिल्म समीक्षा…शुभकामनायें

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ५:५० अपराह्न 
एगो भूमिका आप भी निभा लेते…. छालीवुड के हीरो – पं० ललित शर्मा… 🙂

वैसे आइडिया बुरा नहीं है सरजी

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali ‘Rajnish’) ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:३१ अपराह्न 
जरा सी खरोंच लगते ही दिल पे लगे उभर उभर आते हैं।

——
कम्‍प्‍यूटर से तेज़!
इस दर्द की दवा क्‍या है….

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ १२:०३ पूर्वाह्न 
अच्छा तो आप फिल्म समीक्षक कब से बन गए ?

सुनीता शानू ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ७:३८ पूर्वाह्न 
चर्चा में आज नई पुरानी हलचल

Smart Indian – स्मार्ट इंडियन ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ८:२१ पूर्वाह्न 
क्षेत्रीय सिनेमा की सचित्र समीक्षा पसन्द आयी।

Khushdeep Sehgal ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ८:२४ पूर्वाह्न 
ललित भाई के लीड रोल वाली अगली फिल्म का टाइटल…

फौजी छत्तीसगढ़िया…

जय हिंद…

mahendra verma ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ९:४५ पूर्वाह्न 
फिल्म की अच्छी समीक्षा पढ़कर इसे देखने का मन हो रहा है।
फिल्म की सफलता के लिए शुभकामनाएं।

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ १०:१४ अपराह्न 
फ़िल्मवा कैसी रहलवा ,

भारतीय नागरिक – Indian Citizen ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ११:१४ अपराह्न 
मजेदार लगती है आपकी समीक्षा पढ़कर तो..

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_06.html

अगस्त 30, 2011 at 3:15 अपराह्न टिप्पणी करे

मि. टेटकू राम

ब्लॉ.ललित शर्मा, शुक्रवार, ५ अगस्त २०११

 

छत्तीसगढी फ़िल्मों के सुपर स्टार अनुज शर्मा की नई फ़िल्म मि. टेटकू राम का प्रीमियर कल सुबह 5 अगस्त 2011 को प्रात: 9 बजे प्रभात टाकीज रायपुर में होने जा रहा है। छइयां भूईयाँ से लेकर मि. टेटकू राम का सफ़र तय करने वाले अनुज शर्मा इस फ़िल्म के प्रोडयुसर एवं हीरो हैं। आप सभी प्रीमियर में सादर आमंत्रित हैं। अब प्रभात टाकीज में आपसे 9 बजे भेंट होगी।
ललित शर्मा, अनुज शर्मा (मि. टेटकू राम) एवं राहुल सिंह जी

आपका इंतजार है

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

16 टिप्पणियाँ to “मि. टेटकू राम”

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ६:४८ पूर्वाह्न 
तो अभी तो टाकीज जाने की तैयारी चल रही होगी?
फिल्म समीक्षा का इंतजार रहेगा|
way4host

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ६:५७ पूर्वाह्न 
चलो भाई आपने अपने यहाँ के हीरो छतीसगढ के टेटकू कुमार के बारे में बताया, ये फ़िल्में एक सीमित इलाके में ही देखी जाती होंगी।

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ७:४१ पूर्वाह्न 
नीचे वाला चित्र तो झाड़ू पोस्‍ट के लायक है. उपर वाले चित्र का तो मुझे आभास भी नहीं था.
गाने सुने हुए हैं फिल्‍म के, बहुत मधुर, कर्णप्रिय और पारंपरिक प्रभाव के, आशा है फिल्‍म का सुर भी ऐसा ही होगा, फिल्‍म की सफलता के लिए शुभकामनाएं.

हेमन्‍त वैष्‍णव ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ८:२१ पूर्वाह्न 
निर्माता निर्देशक और पूरी टीम को बधाई……….

ali ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ८:३० पूर्वाह्न 
@ मध्य वाला चित्र ,

प्रोड्यूसर सह हीरो अनुज शर्मा के साथ फिल्म के डायरेक्टर और एडीटर जैसे इन दोनों बन्दों से परिचय नहीं कराया आपने 🙂

चित्र के पार्श्व वाले सज्जन नि:संदेह असिस्टेंट …डायरेक्टर/प्रोड्यूसर/एडीटर वगैरह वगैरह हो सकते हैं 🙂

Udan Tashtari ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ८:३७ पूर्वाह्न 
चलो, इस बहाने मिल लिये इनसे भी…कभी बेम बज्जर पर बिल्लोरे जी सेवा ले इनको ले आईये…

Shah Nawaz ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ९:०५ पूर्वाह्न 
नीचे वाला पोस्टर बहुत ज़बरदस्त डिजाईन किया है.

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ९:०६ पूर्वाह्न 
लो हम भी आ गए ……आपका इन्तजार ख़त्म …..!

Arunesh c dave ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ९:१६ पूर्वाह्न 
पहले नई बतातेस जी हिरोइन संग गोठ करे के इच्छा रहिस. मस्त पुटियार के पेप्सी पिलातेव ओला

Khushdeep Sehgal ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ९:३३ पूर्वाह्न 
ललित भाई,
फिल्म में आपका भी रोल है तो पूरी ब्लॉगर बिरादरी की ओर से वादा है कि सब इस फिल्म को देखेंगे…चाहे रायपुर ही क्यों न आना पड़े…

जय हिंद…

Murari Pareek ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ १०:०१ पूर्वाह्न 
यार ललित जी कहीं कोई टेटकू रामजी के साथ मुझे भी फंसाइए न!!!

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ १०:०४ पूर्वाह्न 
अनुज शर्मा कला के क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ नाम है . तुम उसे नायक से खलनायक मत बना देना .

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ १०:०८ पूर्वाह्न 
बहुत बढ़िया…. समीक्षा का ज़रूर इंतजार रहेगा…

ताऊ रामपुरिया ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ११:३७ पूर्वाह्न 
सफ़लता के लिये हार्दिक शुभकामनाएं. परिचय की कमी खल रही है.

रामराम.

S.M.HABIB ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ८:३४ अपराह्न 
बधाई…. शुभकामनाएं…

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ८:५६ अपराह्न 
देखने में तो जोरदार लग रही है।

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_05.html

अगस्त 30, 2011 at 3:13 अपराह्न टिप्पणी करे

अथ सम्मार्जनी कथा

ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, २ अगस्त २०११

 

छिन बाहरी (झाड़ू)

झाड़ू को संस्कृत में सम्मार्जनी कहते हैं, यह आदिम काल से ही मानव की सहचरी बनी हुई है। भोर होते ही घर-भीतर से लेकर आंगन की साफ़-सफ़ाई करती  है। मानव ने अग्नि के अविष्कार के पूर्व झाड़ू का अविष्कार कर लिया। उसे निस्तारी के लिए साफ़-सुथरी भूमि की आवश्यकता हुई तो घास की कुछ सीकों को एकत्र करके झाड़ू बनाई और नित्य सम्मार्जन का कार्य प्रारंभ किया। कहने का तात्पर्य है कि आदिम मानव ने झाड़ू का निर्माण कर इसे सहज ही अपना लिया। आदिम मानव से लेकर आज तक झाड़ू का सफ़र जारी है। झाड़ू निरंतर मानव सभ्यता को बचाने एवं संवारने में लगी है। जिसके घर या स्थान पर साफ़-सफ़ाई नहीं होती और कूड़ा-करकट पड़े रहता है उसे मानव समाज सभ्य नहीं मानता अर्थात मानव को सभ्य बनाने में झाड़ू का प्रथम एवं प्रमुख स्थान है। सम्मार्ज्जनश्च संशुद्धिः संशोधने विशोधने।

चंवर का प्रयोग-चंवर डुलाते हुए (गुगल से साभार)
कहावत है कि कुत्ता भी कहीं बैठता है तो पूंछ से झाड़ कर बैठता है। संसार निर्माता ने पशुओं की शारीरिक संरचना में ही झाड़ू पूंछ के रुप में संलग्न कर दी। जिससे पशु अपनी पूंछ का उपयोग झाड़ू के रुप में करते हैं। मक्खी उड़ाने से लेकर बैठने के स्थान को झाड़ने का काम पूंछ ही करती है। डार्विन का कहना है कि वनपशु के क्रमिक विकास परिणाम वर्तमान मानव है। मानव द्वारा हाथों से काम लेने के कारण पूंछ की उपयोगिता खत्म हो गयी, इसलिए मानव शरीर से पूंछ रुपी झाड़ू विलुप्त हो गयी। जैसे-जैसे मानव सभ्य होता गया, झाड़ू सिर चढकर बोलने लगी। आंगन और घर बुहारते-बुहारते चँवर बनकर मक्खियाँ उड़ाने एवं हवा देने का काम करने लगी। राजा-महाराजा एवं देवी-देवताओं को चँवर (चँवरी भी कहते हैं) रुपी झाड़ू शोभायमान होने के साथ-साथ इनके सानिध्य में झाड़ू ने चँवर का रुप ग्रहण कर सम्मान पाया।
भित्ती चित्र- (गुगल से साभार)

झाड़ू को कूंची, बुहारी, बहरी, बहारी, सोहती, बढनी इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। जहाँ तक मानव सभ्यता का विकास एवं विस्तार हुआ वहाँ तक झाड़ू उसका साथ निभाया और साथ निभा रही है। इसने कूंची, ब्रश, दंताली, से लेकर वैक्युम क्लीनर तक एवं धरती से लेकर अंतरिक्ष तक का सफ़र तय किया। अमीर से लेकर गरीब तक, निर्बल से लेकर सबल तक, मुर्ख से लेकर विद्वान तक, चरित्रहीन से लेकर चरित्रवान तक सभी को झाड़ू समान भाव से अपनी सेवाएं प्रदान कर रही है। इसने किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। सफ़ाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य को करने वाली झाडू प्राचीन काल से ही उपेक्षा का शिकार हुई।मिश्र, हरक्वेलिनियम, पाम्पेई, हड़प्पाकालीन सभ्यता के प्रकाश में आने लेकर वर्तमान में हो रहे उत्खन्न में कहीं पर झाड़ू के चिन्ह प्राप्त नहीं होते। आदिम काल से झाड़ू की सेवाएं लेने वालों ने मुर्तियों, चित्रों एवं शैल चित्रों में इसे उल्लेखित नहीं किया। इसे हम कृत्घ्नता ही मानेगें।

ग़ड़ोरी जाति की महिला

झाड़ू के फ़ुलकांसबहारी, छिनबहारी, खरहेराबहारी (बांस से निर्मित), बरियारी,बलियारी बहारी (बलियारी आयुर्वैदिक औषधि है,इसकी जड़ का प्रयोग पौरुष शक्ति बढाने में एवं पत्र एवं पुष्प भी औषधि रुप में प्रयुक्त होते हैं) , मोरपंखीबहारी (तांत्रिक उपयोग हेतु) आदि कई प्रकार हैं। छत्तीसगढ में झाड़ू का निर्माण गड़ोरी नामक जाति करती है। इनका मुख्य पेशा झाड़ू बनाना एवं शिकार करना ही है। विशेष कर ग़ड़ोरी लोग छिन की बहारी ही बनाते हैं। छिन की झाड़ू भारत से लेकर अफ़्रीका तक में बनती है। बांस की बहारी कंडरा जाति के लोग बनाते हैं। झाड़ू से झाड़ना शब्द बनता है।झाड़ू लगाना या सफ़ाई करना मेहतर या झाड़ूबरदार जाति विशेष का कार्य है। कभी-कभी वर्ष में राजा-महाराजा भी एक बार झाड़ू लगा लिया करते हैं, जगन्नाथ भगवान की रथ यात्रा के मार्ग को राजा सोने की झाड़ू से बुहारता है तब रथ यात्रा प्रारंभ होती है। बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के रथ भ्रमण का प्रारंभ राजवंशियों के झाड़ू से मार्ग बुहारने के पश्चात होता है। ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद स्वयं को जमीन नेता बनाने के लिए सड़क पर अक्सर झाड़ू लगाते हैं तथा सफ़ाई कर्मियों की बैठक में हिस्सा लेते हैं।

झाड़ू पर सवार गोरी चुड़ैल (गुगल से साभार)
बैगा-गुनिया,तांत्रिक मोर पंखी झाड़ू का उपयोग भूतप्रेत झाड़ने में करते हैं। मेरे नाना जी के पास भी मोर पंखी झाड़ू थी, जिससे वे झाड़-फ़ूंक करते थे। गोरी (अंग्रेज) चुड़ैलों का वाहन झाड़ू ही है। गोरी चुड़ैलों की कहानी में इन्हे झाड़ू पर सवार दिखाया जाता है, विदेशी कहानियों में इसका जिक्र आता है। भोपाल के मेलादपुर में मंदिर का पुजारी झाड़ू से पीट कर भूत उतारता है। यहाँ इतनी भीड़ होती है कि इसे भूतों का मेला कहा जाने लगा है। मनौती मानने के लिए लोग कई जगह झाड़ू की भेंट चढाते हैं। मुरादाबाद के बहजोई में बने मंदिर में शिव की झाड़ू से पूजा की जाती है,महादेव का आशीर्वाद झाड़ू चढ़ाकर मांगा जाता है, कहते हैं कि झाड़ू चढाने से भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी कर देते हैं।

उत्तरप्रदेश के जनपद मुज़फ्फरनगर के गाँव सोरम में साग्रीबपीर बाबा की मजार पर(जिसे लोग सोरम साग्रीब पीर और झाड़ू वाले पीर बाबा के नाम से भी जानते है) प्रसाद के रूप में झाड़ू चढ़ाई जाती है देश के कोने कोने से सभी धर्मो के श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए मन्नत मांगने आते है | मान्यता है की किसी भी मनुष्य को कोर्ट कचहरी से बचना हो या फिर पारिवारिक विवाद ,या घरो में खटमल हो गए हो ,और या फिर किसी के शरीर पर मस्से हो गए हो तो यहाँ झाड़ू चढाकर मन्नत मांगने से इच्छा पूरी हो जाती है।चीन के जिलिन राज्य के चांगचुन शहर के निवासी जू मिंग ने गोल्डन रिट्रीवर प्रजाति के अपने कुत्ते को झाड़ू लगाना सिखाया। यह अपने मालिक के साथ सड़क पर टहलते हुए झाड़ू लगाता है। यह कुत्ता टहलते हुए हमेशा अपने मुंह में पकड़े हुए छोटे से झाड़ू से झाड़ता है।

फ़ुलकांस बहारी

मान्यता है कि झाड़ू लक्ष्मी का रुप है, यह घर की दरिद्रता को बाहर कर धन-समृद्धि लाती है।  जिस घर में साफ़-सफ़ाई रहती है, वहाँ लक्ष्मी का वास रहता है, दरिद्रता दूर होती है। जिस घर में झाड़ू नहीं लगती वहाँ भूत-प्रेतों का वास होने के कारण हमेशा आर्थिक विपन्नता रहती है। झाड़ू लगाने के नियम और कायदे भी हैं। झाड़ू को पैर नहीं लगाते, पैर लगने से इसे छूकर माफ़ी मांगी जाती है। इसे घर में दरवाजे के पीछे छुपा कर रख जाता है। कहते हैं कि अगर झाड़ू बाहर दिखाई देती है तो घर में कलह होता है। इसे बिस्तर पर एवं पूजा स्थान पर रखने एवं शाम एवं रात्रि के समय झाड़ू लगाने की मनाही है। धन-संपत्ति लाभ हेतू टोटका बताया जाता है कि रविवार या सोमवार को तीन झाड़ू खरीदकर उसे किसी मंदिर में रख देना चाहिए,ध्यान रहे कि झाड़ू ले जाते हुए एवं मंदिर में रखते हुए कोई देखे नहीं, इससे अर्थ जनित समस्याएं दूर हो जाती है। झाड़ू दरिद्रता दूर करने के टोटके के भी रुप में काम आती है। सपने में झाड़ू देखना हानिकारक बताया गया है।

बेबी हालदार (गुगल से साभार)

झाड़ू ने लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया, एक झाड़ू के सहारे परिवार चलता है। गरीबी एवं विपत्ति के समय अनपढ या कम पढी-लिखी महिलाओं का झाड़ू-पोंछा जीवन यापन का सहारा बनता है। झाड़ू पोंछा करने वाली बेबी हालदार आज एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के रुप में स्थापित है। “आलो आँधारि” लिख कर उनकी कीर्ति पुरी दुनिया में जगमगा रही है। विश्व के कई देशों में भ्रमण कर चुकी बेबी हालदार को हांगकांग जाते समय दिल्ली एयरपोर्ट  पर रोक दिया गया। उसे सिक्योरिटी वाले लेखिका बेबी हालदार मानने को तैयार नहीं थे। लेखिका होने के साथ दिखना भी जरुरी है। बेबी साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेकर हांगकांग, पेरिस से होकर आ चुकी है और आज वह देश के भी कई शहरों में वायुयान से आती-जाती हैं, जो उनकी संघर्ष का नतीजा है। न्यूयार्क टाइम्स, बीबीसी, सीएनएन-आइबीएन आदि पर उसका इंटरव्यू आ चुका है।

छिन (खजुर के जैसा वृक्ष) झाड़ू

बेलन के पश्चात झाड़ू ही एक ऐसा शस्त्र है, जो गृहणी को सदा सुलभ रहता है, कई जगह इस मारक शस्त्र का प्रयोग होते भी देखा जाता है। गृहणी को क्रोध आने पर झाड़ू युद्ध एवं उसकी मूठ से कुटाई होने की आशंका बनी रहती है। लंदन के एक घर में दो हथियारबंद लुटेरे चोरी की नीयत से घुस गए। 90 एवं 49 वर्षीय दो व्यक्तियों को बांधकर उनसे 50 डालर छीन लिए। जब वे सीढियाँ चढ कर उपर जाने लगे तो एक 43 वर्षीय महिला से सामना हो गया जो झाड़ू लेकर उनका इंतजार कर रही थी। उसका रौद्ररुप एवं हाथ में झाड़ू देखकर चोरों के होश उड़ गए और वे भाग खड़े हुए। इस तरह झाड़ू ने एक घर को लुटने से बचा लिया। झाड़ू कारगर हथियार है, अगर समय पर उपलब्ध हो जाए तो।

बलियारी का पौधा

चोर मौका पाते ही झाड़ू लगा जाते हैं, सरकार भी झाड़ू लगाती है, क्रिकेटर भी झाड़ू लगाकर (स्वीप) रन बनाते हैं। झाड़ू आदिमकाल से मानव की सेवा में रत है। इसके बिना घर की स्वच्छता की कल्पना नहीं की जा सकती। किसी के पास मकान नहीं पर भी उसके पास एक अदद झाड़ू मिल ही जाएगी। कच्चे-पक्के घरों एवं आंगन को बुहारने के लिए पृथक-पृथक झाड़ूओं का प्रयोग होता है। छत्तीसगढ अंचल में धान पकने के पश्चात ब्यारा (खलिहान) का निर्माण किया जाता है। धान मींजने(निकालने) के लिए बेलन या ट्रेक्टर चलाने लायक भूमि की घास को छील कर उसे गोबर से लीपा जाता है। जिससे धान के दाने खराब न हों। लीपने के कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व ब्यारा में होम धूप देकर बलियारी की झाड़ू से ही लीपा जाता है। बलियारी बलवर्धक माना जाता है। इस तरह झाड़ू हमारे जीवन का एक अंग है। जिसके बिना हम दिन की शुरुवात करने की कल्पना ही नहीं कर सकते। सुरज भी कभी-कभी साथ छोड़ देता है, उगता नहीं या बादल ढक लेते हैं। परन्तु झाड़ू प्रत्येक काल परिस्थिति में मानव का साथ निभाते आई है। इसलिए वैदिक वांग्मय ने इसे सम्मार्जनी कह कर सम्मानित किया, मानव समाज के लिए झाड़ू वंदनीय है।

 

COMMENTS :

44 टिप्पणियाँ to “अथ सम्मार्जनी कथा — ललित शर्मा”

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ७:२० पूर्वाह्न 
वाह ! झाड़ू पुराण पढकर तगड़ा ज्ञान वर्धन हुआ |

Udan Tashtari ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ८:०० पूर्वाह्न 
जय हो झाड़ू पुराण की…अथ श्री प्रथम अध्यायम……सम्पातमः!!! जय हो स्वामी ललितानन्द महाराज की!!!

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ८:१२ पूर्वाह्न 
शिवजी के मंदिर में झाड़ू चढ़ती है , सुना ही था , आपने कन्फर्म कर दिया !
सफाई करने की प्रक्रिया में हर गन्दगी साफ़ कर देने वाली झाड़ू लक्ष्मी का रूप भी है , दादी कभी भी इसे पैर नहीं लगाने देती थी …इसके साथ बेबी हालदार का जिक्र इसकी सार्थकता को बढ़ा गया , सफाई करने वाले हाथ जब लेखन करने लगते हैं तब भी कहाँ पीछे रहते हैं …
वैक्यूम क्लीनर भी है मेरे पास मगर झाड़ू जैसी सफाई उससे कहाँ संभव है ! झाड़ू और बेलन दोनों हथियारों पर आपने रोचक जानकारी दी … गृहिणियों की हौसला अफजाई के लिए आभार !

शिकायत है आपसे , आप जैसे विद्वान् भी झाड़ू और बेलन पर लिख देंगे तो हम गृहिणियां किस पर लिखेंगी 🙂

रोचक, ज्ञानवर्धक पोस्ट !

दर्शन लाल बवेजा ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ८:१६ पूर्वाह्न 
बेलन के पश्चात झाड़ू ही एक ऐसा शस्त्र है, जो गृहणी को सदा सुलभ रहता है
ha ha ha ah

Mrs. Asha Joglekar ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ८:४४ पूर्वाह्न 
अरे वाह ये सम्मार्जनी कथा तो बडी रोचक और ज्ञानवर्धक रही । हमारे माँ के घर में लक्ष्मी पूजन में देवी के चित्र के साथ नई झाडू की भी पूजा की जाती थी ।

सतीश सक्सेना ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:०८ पूर्वाह्न 
@ सब खैरियत तो है जनरल !
भगवान से दुआ करता हूँ कि ललित भाई के साथ ऐसा वैसा न हुआ हो …
भाभी जी को प्रणाम 1
आपको दिली शुभकामनायें !

निर्मला कपिला ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:१५ पूर्वाह्न 
इस झाडू पुराण ने तो हमारी बुद्धी का ही मार्जन कर दिया। तभी तो इसे सम्मार्जनी कहते हैं। बहुत मेहनत की है इस पोस्ट पर। शुभकामनायें।

Arunesh c dave ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:३३ पूर्वाह्न 
झाड़ू से पिटते पतियों का जिक्र न कर आपने पत्नी पीशित संघ के समस्त सदस्यो का अपमान किया है 24 घंटे मे भूल सुधार न करने पर आपके खिलाफ़ धरना प्रदर्शन किया जायेगा ।

amrendra “amar” ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:३६ पूर्वाह्न 
रोचक, ज्ञानवर्धक पोस्ट !
इस झाडू पुराण ने तो हमारी बुद्धी का ही मार्जन कर दिया। तभी तो इसे सम्मार्जनी कहते हैं।
शुभकामनायें !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:३७ पूर्वाह्न 
अथ श्री सम्मार्जन कथा। बहुत कुछ जानने को मिला इस विषय में।

P.N. Subramanian ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:४७ पूर्वाह्न 
शर्माजी, सम्मार्जनी की कथा न केवल रोचक अपितु ज्ञानवर्धक भी रही. बहारी की अहमियत पर एक अनोखा आलेख. आभार.

Anil Kumar Mishra,Umaria(MP) ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:५२ पूर्वाह्न 
yadi jhadu par kisi ko shodh patra likhni ho to aap ka yah aalekh bahut madadagar hoga .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:५२ पूर्वाह्न 
सुबह सुबह झाड़ू मारने के लिए धन्यवाद!

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:५९ पूर्वाह्न 
अद्भुत, ब्‍लाग साहित्‍य भंडार की अनुपम निधि.
एक झाड़ू, ‘अकासबहरी’ धूमकेतु पुच्‍छल तारा उगा करता था साठादि के दशक में.
मजेदार कि जिस सम्‍मार्जनी से मार्जन, मज्‍जन हो कर मंजन बनता है वह पेस्‍ट के लिए रूढ़ हुआ न कि ब्रश के लिए.
प्रूफ रीडिंग के काम को झाड़ू लगाने जैसा कहा जाता था, यानि कुछ न कुछ निकल ही आता है. आपके इस पोस्‍ट की वंदना करते हुए हमने भी एक बार फेरने की कोशिश कर ली.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १०:०४ पूर्वाह्न 
सम्मार्जनी कथा बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत की .. घर घर में पाई जाने वाली झाड़ू पर विस्तृत जानकारी .. बेबी हालदार के विषय में आपकी ही पोस्ट से जानकारी मिली .. बहुत सार्थक पोस्ट

Vijay Kumar Sappatti ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १०:४० पूर्वाह्न 
जय हो झाड़ू पुराण की…आपका ज्ञान बहुत ही शानदार है .. कहाँ कहाँ से विषय ले आते है .

रवीन्द्र प्रभात ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १०:४८ पूर्वाह्न 
रोचक, ज्ञानवर्धक पोस्ट !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १०:५७ पूर्वाह्न 
wah re jhaaaru tere pe bhi vistar se charcha ho gayee….
behtareen:)

जी.के. अवधिया ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ११:११ पूर्वाह्न 
झाड़ू के विषय में बहुत अच्छी जानकारी!

वैसे आपने यह नहीं बताया कि छत्तीसगढ़ में नाम भी ‘झाड़ूराम’ रखे जाते हैं।

Mithilesh dubey ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ११:३६ पूर्वाह्न 
badhiya likhe hain bhiya

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ११:५९ पूर्वाह्न 
@जी.के. अवधिया

झाड़ूराम का उल्लेख मैने जानबूझ कर नही किया। आपके कहने के लिए कुछ तो बचा कर रखना था… हा हा हा

झाड़ूराम पर एक पोस्ट ही लिखुंगा फ़ोटु सहित।

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १२:०७ अपराह्न 
पंडित जी, आप तो पुरे एनसाईंकलोपीडिया सिद्ध हो रहे हो…… झाड़ू….. सम्मार्जनी – संस्कृत में कितना इज्ज़तदार नाम है – उसके पेशे की तरह……
और हाँ…. जो झाडू फोटू में दिखा रखा है – यहाँ बहुत ढूंढने पर मिलता है …….. चलता ज्यादा है – इसलिए फेक्टरी में यही मंगवाता हूँ….

rakesh tiwari ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १२:०९ अपराह्न 
ek jhadu “JHADURAM DEWANGAN” bhi vandniy hai.

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १२:१३ अपराह्न 
@rakesh tiwari

हौ भैया, ओखरे उपर एक ठीक पोस्ट बनाना हे। जतना भी झाड़ूराम हे जम्मो ला एके पोस्ट संगराहूँ।

जोहार ले।

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १:०१ अपराह्न 
सम्मार्जनी की कथा बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक है. इसके इतने सारे नाम और रूप… अद्भुत… आलेख… आभार…

anu ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ १:०३ अपराह्न 
१………बाबा की मजार पर(जिसे लोग सोरम साग्रीब पीर और झाड़ू वाले पीर बाबा के नाम से भी जानते है) प्रसाद के रूप में झाड़ू चढ़ाई जाती है
२……..मुरादाबाद के बहजोई में बने मंदिर में शिव की झाड़ू से पूजा की जाती है,महादेव का आशीर्वाद झाड़ू चढ़ाकर मांगा जाता है, कहते हैं कि झाड़ू चढाने से भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी कर देते हैं।…………………आज तक इस जानकारी से महरूम थी ….धन्यवाद इस लेख को पढवाने के लिए

जय हो भाई जी …..धन्य हो आप ……कहाँ कहाँ से सोच कर आप विषय लेते हो
झाड़ू पर लिख दिया….और वो भी इतना रोचक …की पढ़ का अच्छा भी लगा और मज़ा भी आया …………..आभार

anu

vedvyathit ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ २:२० अपराह्न 
sundr bdhai

vidhya ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ४:३१ अपराह्न 
रोचक, ज्ञानवर्धक पोस्ट !

नरेश सिह राठौड़ ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ५:०८ अपराह्न 
अथ श्री झाड़ू पुराण !मजा आ गया इस उम्दा शोध परक लेख को पढकर |

Sunil Kumar ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ५:४३ अपराह्न 
रोचक, ज्ञानवर्धक पोस्ट !
बहुत सी नयी बातें मालूम हुईं , आभार

PRAMOD KUMAR ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ५:४९ अपराह्न 
शर्मा जी आपको तो झाड़ू पर विस्तृत शोध पत्र प्रस्तुत करने के उपलक्ष्य में डॉक्टरेट की मानद उपाधि मिलनी चाहिए………..!
आपने झाड़ू जैसे अत्यंत साधारण वस्तु का बखान करके झाड़ू का गौरव बढ़ाने के साथ ही झाड़ू को और भी वंदनीय बना दिया……….!
हमारे यहॉं भी विजयदशी एवं धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने की परम्परा रही है……..!
सभी साथियों की टिप्पणियां मजेदार लगी………!

चंदन कुमार मिश्र ने कहा… 

on 

 २ अगस्त २०११ ९:५४ अपराह्न 
झाड़ू से झड़ुआना। सुनने को अक्सर मिल जाता है बहुत घरों में। खासकर बच्चों को।

अब दो बातें याद आईं झाड़ू पर।
पहली कि झाड़ू ज्ञान दान भी करती है। यह खुद गंदा होती है लेकिन दूसरों को साफ कर जाती है।

दूसरी यह कि बचपन स्कूल में सफाई मंत्री हुआ करता था और मैं एकमात्र मंत्री था जो अपना काम करता था। सफाई मंत्री का काम होता था हर दिन चार छात्रों द्वारा स्कूल में झाड़ू लगवाना। लेकिन खुशी थी कि प्रधानमंत्री की भी बारी आती थी और उससे भी झाड़ू लगवाता था।

अच्छा लगा आपका झाड़ू-वर्णन। नये विषय को छुआ आपने। धन्यवाद।

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ १:१८ पूर्वाह्न 
रोचक पोस्ट !

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ ३:२९ पूर्वाह्न 
रोचक भी ज्ञानवर्धक भी…

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ ८:१५ पूर्वाह्न 
सम्मार्जनी मतलब झाड़ू हर एक पंक्ति में गहरा ज्ञान का भण्डार समाहित कर दिया आपने …..आपका आभार

रेखा ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ १०:५६ पूर्वाह्न 
जानकारियों से भरी रोचक पोस्ट …….आभार

डॉ0 विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ ११:१७ पूर्वाह्न 
bahut achchi jhadu lagayee aapne! tadpatra se vaccum cleener ke vikas yatra par bhi roshani daliye!!!!

बी एस पाबला ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ ३:३० अपराह्न 
झाड़ू द्वारा सम्मान-अर्जन हुआ लगता है 🙂
(सतीश सक्सेना जी की टिप्पणी से प्राप्त प्रेरणा)

kase kahun?by kavita verma ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ ७:४२ अपराह्न 
bahut gahan adhyayan hai jhadoo par….cheez bhale tuchchh mani jaye par iska mahatv vakai bahut adhik hai…sarthak post..

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ ८:२३ अपराह्न 
बहुत ही रोचक जानकारी विस्तार से मिली । आभार ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 ३ अगस्त २०११ ८:४० अपराह्न 
आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 04- 08 – 2011 को यहाँ भी है

नयी पुरानी हल चल में आज- अपना अपना आनन्द –

आकल्‍प ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ४:१७ अपराह्न 
आपका ज्ञान और दृष्टि बेमिसाल है

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 ५ अगस्त २०११ ५:३८ अपराह्न 
झाडू पर इतने सारे प्‍वाइंट्स .. कमाल का लेखन है .. बहुत जानकारी मिली !!

सुनील गज्जाणी ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १:२१ अपराह्न 
रोचक, ज्ञानवर्धक पोस्ट !
इस झाडू पुराण ने तो हमारी बुद्धी का ही मार्जन कर दिया। तभी तो इसे सम्मार्जनी कहते हैं।
शुभकामनायें !

अगस्त 30, 2011 at 3:11 अपराह्न टिप्पणी करे

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