लोक देवता गुगापीर

ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, २३ अगस्त २०११

 

गुगादेव, गोगापीर, जहरपीर
बात 1987 के अगस्त माह की है, उन दिनों रायपुर से दिल्ली के बीच सीधी ट्रेन 36गढ एक्सप्रेस ही चलती थी। दिल्ली से इसका रायपुर वापसी का समय भोर में ही था। इसलिए देर रात तक प्लेटफ़ार्म में पहुंच कर ट्रेन का इंतजार करना ही पड़ता था। सो मैं भी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। उस दिन स्टेशन में बहुत भीड़ थी। पीत वस्त्रधारियों का रेलम-पेल था। स्टेशन में तिल धरने की भी जगह नहीं। जो भी ट्रेन आती थी ये उसमें बाल-बच्चों समेत घुस जाते थे। पटरियों पर शौचादि से भी भीड़ को परहेज नहीं था। कुल मिलाकर भीड़ की अराजकता वैसे ही चारों ओर दिखाई दे रही थी,  जैसे किसी मेले-ठेले के समय होती है। मुझे भी जिज्ञासा हुई कि ये सब एक ही गणवेश में कहाँ जा रहे हैं? पुछने पर पता चला कि भीड़ गुगा के मेले में गुगामैड़ी जा रही है। अब गुगामैड़ी भूगोल में कहाँ पर है और ऐसा क्या विशेष है वहाँ जो लोग ट्रेन की छतों पर भी सवार हो कर जा रहे हैं। कई सवाल दिमाग में चल रहे थे। तब मैने राजस्थान का अधिक सफ़र नहीं किया था, नही अधिक जानकारी रखता था। लेकिन गुगापीर के विषय में सुना था।
आज गुगानवमी है, आज के ही दिन गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वंश के शासक जैबर (जेवरसिंह) की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था। लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। यह गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है। गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान है। इन्हे हिन्दु गुगादेव, गुगापीर के नाम से मानते हैं और उत्तर प्रदेश में जाहर पीर और मुसलमान गोगापीर कहते हैं। दोनो धर्मों के लोग इनको समान रुप से मानते हैं।
गोगादेव के जन्मस्थान ददरेवा, जो राजस्थान के चुरू जिले की राजगढ़ तहसील में स्थित है। यहाँ पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं। नाथ परम्परा के साधुओं के ‍लिए यह स्थान बहुत महत्व रखता है। दूसरी ओर कायमखानी मुस्लिम समाज के लोग उनको जाहर पीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मत्‍था टेकने और मन्नत माँगने आते हैं। इस तरह यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है।मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। लोक देवता जाहर पीर गोगाजी की जन्मस्थली ददरेवा में भादवा मास के दौरान लगने वाले मेले के दृष्टिगत पंचमी (सोमवार) को श्रद्धालुओं की संख्या में प्रतिवर्ष वृद्धि होती है। मेले में राजस्थान के अलावा पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, हिमाचाल व गुजरात सहित विभिन्न प्रांतों से श्रद्धालु पहुंचते हैं एवं अपनी मन्नत मानते हैं।
कहते हैं कि गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा बने। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले पर मस्जिदनुमा बना हुआ है, इसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला का बोध कराती हैं। कहा जाता है कि फिरोजशाह तुगलक सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक व उसकी सेना ने एक चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना आ रही है। तुगलक की सेना में हाहाकार मच गया। तुगलक की सेना के साथ आए धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान सिद्ध है जो प्रकट होना चाहता है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते समय गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया।
गोगादेव का विवाह कोलुमण्ड की राजकुमारी केलमदे के साथ होना तय हुआ था किन्तु विवाह होने से पहले ही केलमदे को एक सांप ने डस लिया. इससे गोगाजी कुपित हो गए और मन्त्र पढ़ने लगे. मन्त्र की शक्ति से नाग तेल की कढाई में आकर मरने लगे. तब नागों के राजा ने आकर गोगाजी से माफ़ी मांगी तथा केलमदे का जहर चूस लिया. इस पर गोगाजी शांत हो गए। जब गजनी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया था तब पश्चिमी राजस्थान में गोगा ने ही गजनी का रास्ता रोका था. घमासान युद्ध हुआ. गोगा ने अपने सभी पुत्रों, भतीजों, भांजों व अनेक रिश्तेदारों सहित जन्म भूमि और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दे दिया।
गोगापीर की समाधि पर हिन्दु एवं मुस्लिम पुजारी
जिस स्थान पर उनका शरीर गिरा था उसे गोगामेडी कहते हैं. हनुमानगढ़ जिले के नोहर उपखंड में स्थित गोगाजी के पावन धाम गोगामेड़ी स्थित गोगाजी का समाधि स्थल जन्म स्थान से लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है, जो साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक है, जहाँ एक हिन्दू व एक मुस्लिम पुजारी खड़े रहते हैं। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगा मेड़ी के मेले में वीर गोगाजी की समाधि तथा गोरखटीला स्थित गुरु गोरक्षनाथ के धूने पर शीश भक्तजन शीश नवाते हैं।कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन नवमी को गुगापीर का जन्मदिन मनाया जाता है। लोक देवता के रुप में स्थापित गुगापीर की पुजा की जाती है। पूजा स्थान की दीवार पर मांडना बनाया जाता है फ़िर उसी को धूप दीप दिखाकर खीर-लापसी का भोग लगाया जाता है। वैसे इस पर्व की हरिजनों (चूहड़ा समाज) में अधिक मान्यता है, पर सभी जातियाँ गुगापीर को मानती है और इनके जन्मदिवस को लोकपर्व के रुप में मनाती हैं।

NH-30 सड़क गंगा की सैर — जाटलैंड से साभार

 

COMMENTS :

23 टिप्पणियाँ to “लोक देवता गुगापीर —- ललित शर्मा”

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ६:१३ पूर्वाह्न 
बचपन से कुम्हार से माटी के गुगाजी लाकर यह पूजा करते आ रहे हैं …इतनी जानकारी आज मिली है…. आभार यह लेख पढवाने का …..

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ७:२१ पूर्वाह्न 
मिट्टी के छोटे छोटे गोगाजी की पूजा होते देखा किये हमेशा , आपने पूरा इतिहास ही बता दिया …
सांप्रदायिक सदभाव की मिसाल है यह परंपरा और त्यौहार !

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ७:२७ पूर्वाह्न 
गोगा जी के बारे में जानकारी देने के लिए आभार ! बचपन में गांव में गोगा जी की साल में एक बार पूजा होते हुए देखा करते थे उस दिन कुम्हार गोगा जी की मिट्टी की बनी प्रतिमाए घर देकर जाते थे उसी प्रतिमा की पूजा होती थी लेकिन हमें तो उस दिन बनने वाले गुलगुलों को खाने से मतलब रहता था ! गोगा जी के बारे में सुना तो खूब है लेकिन इतने दिनों में आज पहली बार इतनी जानकारी मिल पाई है |
एक पुस्तक में मिली जानकारी के अनुसार गोगा जी सन् १२९६ में फिरोजशाह से युद्ध करते हुए देवलोक हुए थे |
राजस्थान के लोक देवताओं में गोगा जी अग्रणी स्थान है और राजस्थान में प्रसिद्ध पांचो पीरो में से एक है |

कायमखानी मुसलमान गोगाजी के ही वंशज है|

राजस्थान के लोक देवता श्री गोगा जी चौहान | Rajput World

-सर्जना शर्मा- ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ७:५३ पूर्वाह्न 
ललित जी जन्माष्टमी और गुगानवमी पर्व पर शुभकामनाएं । जाहरवीर गुगा पीर को ज्यादातर हरिजन पूजते हैं । इस पर मुझे कुछ संदेंह है । क्योंकि मैनें तो बचपन से अपने घर में और अपने पास सबको गुगानवमी की पूजा करते देखा है । सब जातियों और वर्णों के लोग उनकी पूजा करते हैं । विशेषकर उत्तर भारत में राजस्थान में ।

सतीश सक्सेना ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:०९ पूर्वाह्न 
नयी जानकारी के लिए आभार !

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:१३ पूर्वाह्न 
@सर्जना जी कुछ लिंक देखिए—ऐसा कहा जाता है कि एक राजपूत राजा थे जिनका नाम जेवर था। उनकी रानी का नाम बाचल था। रानी लंबे समय से संतानहीनता का दंश रही थी, को एक साधु ने आर्शीवाद के साथ गोगल (सांप के जहर से बना लुगदीनुमा मणी जैसा) भी दिया। उस रानी ने इस गोगल के पांच भाग किए तथा चार भाग अपनी सेविकाओं को भी दे दिया जो संतानहीन थी। उनमें से एक भाग मेंहतरानी (चुहड़ी) को तथा एक टुकड़ा घोड़ी को भी दिया। एक भाग स्वयं रानी ने भी खाया। रानी से जो पुत्र पैदा हुआ वह गागापीर कहलाए। कहीं-कहीं इन्हें गोगावीर भी कहते हैं। जो पुत्र मेहतरानी से हुआ वे रत्नाजी चावरिया कहलाए चूंकि गोगल के रिश्ते से दोनों भाई थे। इसलिए चूहड़ा समाज के लोगों ने इन पर विशेष श्रद्धा दिखाई।

http://www.3dsyndication.com/dainik_bhaskar_hindi_news_features/Religion%20&%20Spirituality/DBHIM4001

http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/817/3/0

दर्शन कौर’ दर्शी ‘ ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:२० पूर्वाह्न 
बचपन में माँ के मुंह से सुनते थे — ‘गोगा -नवमी ‘ ! और रात को हरिजन लोगो की बस्ती से निकलती थी शोभायात्रा ! जिसे ‘ इंदौर’ में ‘छड़ी ‘ कहा जाता हैं …बहुत जोरशोर से निकलती थी यह शोभायात्रा!

गोगाजी की कहानियां ‘ कठपुतली ‘ वाले भी अपनी कला में दिखाते हैं ?

S.M.HABIB (Sanjay Mishra ‘Habib’) ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:२३ पूर्वाह्न 
बहुत उल्लेखनीय जानकारी समेटे लेख… सुन्दर चित्रण…
सादर बधाई…

ali ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:३७ पूर्वाह्न 
ललित जी ,
रतन सिंह शेखावत जी की टिप्पणी में एक शब्द ‘साल’ ( गोगा जी की साल ) का उल्लेख है ! मंडोर , जोधपुर घूमते वक़्त ‘देवताओं की साल’ देखी थी !
हमारे घर गाय कोठे को साल कहते हैं और फिर घुड़साल भी सुना है ! उत्सुकता यह है कि यह शब्द मूलतः किस भाषा का है ? क्या यह सिर्फ आश्रय स्थल के आशय में ही प्रयुक्त होता है ? इसके अतिरिक्त और जो भी जानकारी आप दे सकें !

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:५८ पूर्वाह्न 
पहली बार गोगाजी के बारे में इतनी सारी जानकारी मिली .. बढिया ज्ञानवर्द्धक आलेख !!

Indranil Bhattacharjee ………”सैल” ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ९:०१ पूर्वाह्न 
बहुत बढ़िया जानकारी मिली … धन्यवाद !

Murari Pareek ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ९:३७ पूर्वाह्न 
गोगाजी के बारे में इतना कुछ नहीं सूना था| पर विस्तार से आपने बताया वैसे हमारे गांव गोगासर को गोगीजी ने ही बसाया था ! उन्ही के नाम पर गाँव का नाम “गोगासर” पड़ा|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ११:२० पूर्वाह्न 
आज 23 – 08 – 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है …..

…आज के कुछ खास चिट्ठे …आपकी नज़र .तेताला पर 
____________________________________

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १२:२१ अपराह्न 
हाँ पंडित जी, आज गूगेबाबे (हम यही कहते हैं) का मेला है गाँव में … बचपन से देखते आ रहे हैं …. पर इतिहास आज पता चला… यही मानते थे.. कि ये नाग के देवता है.. और इनकी पूजा करने से नाग कुछ नहीं कहते..

भंगी ही सबसे पहले गुगा बाबा के झंडे के साथ जाते हैं… और हाँ.. गुलगुले का प्रसाद.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १:०७ अपराह्न 
नयी जानकारी मिली …आभार

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ३:०३ अपराह्न 
बहुत अच्छी जानकारी…

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ३:५२ अपराह्न 
रोचक और सार्थक जानकारी

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १०:१५ अपराह्न 
नई जानकारी देने के लिए आभार .

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १०:५६ अपराह्न 
रोचक जानकारी देने के लिए आभार…

anu ने कहा… 

on 

 २४ अगस्त २०११ १२:०२ अपराह्न 
भाई जी आपके लेख पढने के बाद ऐसा लगता है कि जैसे मै ज्ञान के मामले में बिलकुल खाली हूँ …..आभार जो आप नई नई जानकारी से हम सबको आवगत करवाते है ……

anu

rightbooks86 ने कहा… 

on 

 २४ अगस्त २०११ १२:५९ अपराह्न 
The visit was useful. Content was really very informative. From http://www.rightbooks.in

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 २४ अगस्त २०११ ९:१२ अपराह्न 
यह नाम अन्‍य क्षेत्रों में जेवीजी (जै वीर गोगाजी) कंपनी के कारण अधिक प्रसिद्ध हुआ था.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 २५ अगस्त २०११ २:२७ अपराह्न 
इतिहास की गाथाओं में छिपा परम्पराओं का मूल।

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_23.html

अगस्त 30, 2011 at 3:34 अपराह्न टिप्पणी करे

पनघट मैं जाऊं कैसे? — जन्माष्टमी विशेष

ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, २२ अगस्त २०११

 

सभी मित्रों को जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

पनघट मैं जाऊं कैसे, छेड़े मोहे कान्हा।
पानी      नहीं    है,    जरुरी   है   लाना।।
बहुत   हुआ  मुश्किल, घरों  से  निकलना।
पानी  भरी  गगरी को,सर पे रख के चलना।
फोडे  ना   गगरी,   बचाना    ओ    बचाना॥
पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा ।
पानी      नहीं    है,    जरुरी    है   लाना॥
गगरी    तो   फोडी   कलाई   भी  ना  छोड़ी।
खूब   जोर  से  खींची  और  कसके  मरोड़ी।
छोडो  जी  कलाई,  यूँ सताना  ना   सताना॥
पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा ।
पानी      नहीं     है,   जरुरी   है   लाना॥
मुंह    नहीं    खोले,  बोले    उसके    नयना।
ऐसी   मधुर   छवि  है, खोये  मन का चयना।
कान्हा   तू   मुरली    बजाना   ओ   बजाना॥
पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा ।
पानी      नहीं    है,   जरुरी   है   लाना॥

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

23 टिप्पणियाँ to “पनघट मैं जाऊं कैसे? — जन्माष्टमी विशेष — ललित शर्मा”

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ९:२५ पूर्वाह्न 
बहुत सुन्दर गीत ।
कान्हा की लीला तो न्यारी थी ।
जन्माष्टमी की शुभकामनायें ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ९:२८ पूर्वाह्न 
सुन्दर रचना ..

जन्माष्टमी की शुभकामनाएं

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ९:३२ पूर्वाह्न 
जन्माष्टमी की बहुत सुन्दर रचना .

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ९:४८ पूर्वाह्न 
वाह ..
बहुत खूब !!
जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं !!

Khushdeep Sehgal ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ९:५३ पूर्वाह्न 
कृष्णा कृष्णा आए कृष्णा,
जगमग हुआ रे घर-अंगना…

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बधाई…

जय हिंद…

sushma ‘आहुति’ ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ९:५५ पूर्वाह्न 
बहुत ही सुन्दर अभिवयक्ति….. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बधाई…

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ १०:०७ पूर्वाह्न 
वही तो!!
आस-पास वालों को सुनाना कि है मुझे पानी लाना, सब जानते हैं कि ये है बहाना। जैसे ही कान्हा ने है बाहर आना इन्होंने दौड़ कर है पहुंच जाना।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ १०:०८ पूर्वाह्न 
बहुत सुंदर ….शुभकामनायें जन्माष्टमी के पावन पर्व की…..

Vijay Kumar Sappatti ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ १०:४६ पूर्वाह्न 
ऐसी मधुर छवि है, खोये मन का चयना।
कान्हा तू मुरली बजाना ओ बजाना॥

bahut sundar rachna lalit ji ..
badhayi ho

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ११:२४ पूर्वाह्न 
बहुत सुन्दर रचना …

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं…

DR. ANWER JAMAL ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ११:३८ पूर्वाह्न 
आपकी रचना बहुत अच्छी है।
मुरली वाले जी के बारे में कुछ कोमल भावनाएं हमारी भी हैं जिन्हें आप देख सकते हैं
ब्लॉगर्स मीट वीकली (5) में
आपके चहेते ब्लॉगर्स के लेख आपके लिए पेश किए गए हैं।
शुक्रिया !

आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
जन्माष्टमी की शुभकामनाएं !

दर्शन कौर’ दर्शी ‘ ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ १२:२७ अपराह्न 
मुंह नहीं खोले, बोले उसके नयना।
ऐसी मधुर छवि है, खोये मन का चयना।
कान्हा तू मुरली बजाना ओ बजाना॥

पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा ।
पानी नहीं है, जरुरी है लाना॥”

वाह ! क्या बात हैं …..ये रंगीन छेड़छाड़…कान्हा के बस की ही बात थी …और उसपर राधा की मन मोह लेने वाली छबी ? क्या बात हैं …

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ २:२५ अपराह्न 
कान्हा की लीलाओं की भावपूर्ण प्रस्तुति ।
आपको भी जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं ।

पी.सी.गोदियाल “परचेत” ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ २:५८ अपराह्न 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

S.M.HABIB ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ३:४८ अपराह्न 
मुंह नहीं खोले, बोले उसके नयना।
ऐसी मधुर छवि है, खोये मन का चयना।
कान्हा तू मुरली बजाना ओ बजाना॥

जय श्री कृष्णा….
जन्माष्टमी की सादर बधाईयाँ….

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ५:५७ अपराह्न 
आपको एवं आपके परिवार “सुगना फाऊंडेशन मेघलासिया”की तरफ से भारत के सबसे बड़े गौरक्षक भगवान श्री कृष्ण के जनमाष्टमी के पावन अवसर पर बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें लेकिन इसके साथ ही आज प्रण करें कि गौ माता की रक्षा करेएंगे और गौ माता की ह्त्या का विरोध करेएंगे!

मेरा उदेसीय सिर्फ इतना है की

गौ माता की ह्त्या बंद हो और कुछ नहीं ! 

आपके सहयोग एवं स्नेह का सदैव आभरी हूँ

आपका सवाई सिंह राजपुरोहित

सबकी मनोकामना पूर्ण हो .. जन्माष्टमी की आपको भी बहुत बहुत शुभकामनायें

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ६:१२ अपराह्न 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

pankaj vyas ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ६:४६ अपराह्न 
acchi rahana, badhai

आशा ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ ७:१९ अपराह्न 
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर हार्दिक शुभ कामनाएं |
आजकी रचना अच्छी लगी |बधाई
आशा

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ १०:०० अपराह्न 
बहुत सुन्दर गीत …
जन्माष्टमी की शुभकामनायें ।

दर्शन लाल बवेजा ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ १०:२३ अपराह्न 
बहुत सुन्दर गीत ।
Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_22.html

चैतन्य शर्मा ने कहा… 

on 

 २२ अगस्त २०११ १०:५० अपराह्न 
जन्माष्टमी की शुभकामनायें

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 २५ अगस्त २०११ २:२८ अपराह्न 
प्यारी सी कविता, शुभकामनायें।

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_22.html

अगस्त 30, 2011 at 3:32 अपराह्न टिप्पणी करे

मै भी अन्ना, तू भी अन्ना, सारा देश है अन्ना

ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, २० अगस्त २०११

 

राजीव तनेजा से साभार
बाबा पिट गए, अन्ना लिपट गए, भीड़ पीछे चल पड़ी, साथ-साथ हम भी चल पड़े हैं टोपी लगाकर। नहीं जाएगें तो लोग समझेगें कि हम भ्रष्ट्राचार का समर्थन कर रहे हैं, इसलिए “जैसी बहे बयार,पुनि पीठ तैसी कीजै”। राम लीला मैदान में ऐतिहासिक लीला जारी है। लोग अपनी उपस्थिति देने पहुच रहे हैं..गाँव-गाँव तक मीडिया ने अन्ना की आवाज पहुंचा दी और भ्रष्ट्राचार से त्रस्त आम जनता सड़कों पर आ गयी। मीडिया ने मुद्दा लपक लिया, अन्ना के बहाने टी आर पी लेने के लिए। भ्रष्ट्राचार से त्रस्त लोगों का एक जन सैलाब उमड़ा, बरसाती नदी की तरह, जनता की भावनाएं उठान पर हैं,सरकार ने अनशन की अनुमति दे दी। हम भी घर बैठे समर्थन दे रहे हैं एक दिनी उपवास रख कर। वैसे भी हमारे समर्थन की कोई कीमत नहीं. कीमत उनके समर्थन की है जो नामी गिरामी हैं, जो हमेशा लाईम लाईट में रहना जानते हैं। मीडिया, ब्लॉग, फेसबुक पर बस यही मुद्दा छा रहा है. भ्रष्ट्राचार का खत्म करने के आन्दोलन का आगाज हो चुका है। अब जनमानस में सिर्फ एक यही बात है कि क्या लोकपाल बिल के पास होने से भ्रष्ट्राचार ख़त्म हो जायेगा?
आज अन्ना के इर्द-गिर्द एनजीओ के लोग दिखाई दे रहे हैं। एनजीओ के काम को देश की जनता जानती है। विदेशों से प्राप्त सहायता से लेकर सरकार के विभिन्न मंत्रालयों की योजनाओं से धन प्राप्त कर अपना एनजीओ चला रहे हैं। फ़टा पुराना कुरता पहने अंग्रजी बोल कर गरीबों को बड़े-बड़े सपने दिखाने वाले ये लोग गरीबी मिटाने की बात कर अपनी अमीरी बढाते हैं और हवाई जहाज से कम यात्रा नहीं करते। क्या इन्होने कभी भ्रष्ट्राचार नहीं किया? सभी जानते हैं कि एक प्रोजेक्ट पास कराने के लिए कितनी राशि की बंदरबांट करनी पड़ती है तब कहीं जाकर कोई काम मिलता है। जब कोई भ्रष्ट्राचार में लिप्त व्यक्ति ईमानदारी का परचम उठाए तो उसे जानने वाले प्रत्येक व्यक्ति को नीयत पर संदेह होता जाता है। अनजाने में ही अन्ना इनकी ढाल बने हुए हैं।
इस आन्दोलन से एक बात तो साफ़ हो जाती है कि देश की जनता भ्रष्ट्राचार से आजिज आ चुकी है। भ्रष्ट्राचार सभी हदें पार कर चुका है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग भ्रष्ट हैं, कुछ अपना कार्य ईमानदारी से करना चाहते हैं पर वर्तमान हालात यह हैं कि यदि कोई ईमानदारी से काम करना चाहता है तो उसे प्रताड़ित कर किनारे लगा दिया जाता है। उसकी हत्या कर दी जाती है। भ्रष्ट्राचार कैंसर की भांति देश की रग रग में समा गया है। यही प्रमुख कारण है कि अन्ना के भ्रष्ट्राचार विरोधी आन्दोलन को जनता का व्यापक समर्थन मिल रहा है और लोग सड़कों पर उतर कर समर्थन दे रहे हैं। अन्ना ही खुद कह रहे हैं कि भ्रष्ट्राचार का 100% निवारण नही तो 65% ही सही, कुछ तो कम होगा। नहीं मामा से काना मामा ठीक है। आज जरुरत है व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की।
इस समय मुझे श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास रागदरबारी के एक पात्र लंगड़दीन की याद आती  है. जो तहसील के बाबु को २ रुपये नहीं देता है और उसकी अर्जी हर बार ख़ारिज हो जाती है. उपन्यास के अंत तक लंगड़दीन के जमीन के सीमांकन की अर्जी स्वीकृत नहीं हो पाती। सवाल सिर्फ दो रुपये का है. पता नहीं इस व्यवस्था ने कितने ही लोगों को लंगड़दीन बना रखा है. इस तरह के लंगड़दीन तहसील, थाना, कोर्ट कचहरी, में मिलते ही रहते हैं. ये सच है कि बिना सेवा शुल्क दिए कोई भी काम किसी भी दफ्तर में संभव नहीं है. अब तो लोगों की मानसिकता यह बन गयी है कि बिना कहे ही नजराना पेश कर देते हैं. डर है कि अगर नहीं दिए-लिए तो काम नहीं होगा.
घर के मुखिया की फौत के बाद उत्तराधिकारी को नामांतरण करना पड़ता है. जमीन जायदाद उनकी है लेकिन नामातरण के लिए के भेंट पटवारी, बाबु तहसीलदार तक पहचानी ही पड़ेगी. एक मित्र ने मुझे मजाक में ही कहा था ” फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक २० बरस घुमती हैं, उसके साथ अर्जी दाता भी घूमता है फिर फाइल गायब हो जाती  है” यही सच है. अगर फाइल पर वजन न हो तो एक जीवन पूरा लग जाता है दीवानगी में. देर-सबेर नित्य ही लोगों को इससे सामना करना ही पड़ता है. ट्रेन में बर्थ के लिए टी.टी. खुले आम घुस लेता है. शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति बचा हो जिसने इनको बिना कुछ दिए सीट या बर्थ पाई हो. बड़े बड़े तुर्रम खां को भी इनके आगे गिडगिडाना पड़ता है. सारी भ्रष्ट्राचार विरोधी भावना एवं नैतिकता धरी की धरी रह जाती है.
भ्रष्ट्राचार वह उल्टा वृक्ष है, जिसकी जड़ें आसमान में है, और हम जमीन खड़े होकर उसकी डालियों एवं शाखाओं को ही काटने की कोशिश करते है. जिसका परिणाम यह होता है कि वह और भी तेजी से बढती है. इसे ख़त्म करना है तो जड़ में ही मठा डालना पड़ेगा। वक्त आ गया है देश के मतदाता को जागना होगा। अपने मतदान से बिना किसी प्रलोभन के ईमानदार सद्चरित्र व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुनें। अगर हम रिश्वत नहीं देगें तो लेना वाला कहाँ से लेगा, काम तो देर सबेर होगा ही। हमें भी प्रण करना चाहिए कि भ्रष्ट्राचरण को बढावा नहीं देगें। किसी पर दोष मढने की बजाए स्वयं को सुधारना आवश्यक है। कहते हैं कि भूत प्राण नहीं लेता पर हलाकान करता है और जब हम भूत के पीछे लठ लेकर पड़ जाते हैं तो वह भाग खड़ा होता है।
पता नहीं कितने लोगों ने आज तक भ्रष्ट्राचार पर लिख कर कलम घिसी होगी. कितने ही लोगों ने भ्रष्ट्राचारियों की शिकायत की होगी. आकंठ तक भ्रष्ट्राचार में डूबे हुए लोगों के कानो पर जूं नहीं रेंगती.नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है? व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, एवं लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाने वाला मिडिया भी इससे अछूता नहीं है, नीरा राडिया और बरखा दत्त प्रकरण जग जाहिर है। भ्रष्ट्राचार का बोलबाला और सच्चे का मुंह काला.
देश के युवाओं के उठ खड़े होने से कु्छ हालात बदलने की आहट सुनाई देती है, किसी ने कहा है कि एक व्यक्ति को कुछ दिनों तक बेवकूफ़ बना सकते हैं, कुछ सौ लोगों को कु्छ हफ़्ते महीनों तक, लेकिन सभी लोगों को हमेशा बेवकूफ़ नहीं बनाया जा सकता। आजादी से लेकर आज तक बेवकूफ़ बनने वाले लोग उठ खड़े हुए हैं इसी आशा में कि कुशासन, सुशासन में बदलेगा। देश को लूटने वाले भ्रष्ट्राचारियों का मुंह काला होगा, उनको सजा मिलेगी। कभी तो नया सबेरा आएगा। मै भी अन्ना, तू भी अन्ना, सारा देश है अन्ना।

 

COMMENTS :

23 टिप्पणियाँ to “मै भी अन्ना, तू भी अन्ना, सारा देश है अन्ना — ललित शर्मा”

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ५:३८ पूर्वाह्न 
समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं …..शुरुआत तो हो…. बाकि तो समय ही बताएगा

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ५:५४ पूर्वाह्न 
हर जगह अन्ना ही अन्ना है, आपने तो लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।

PADMSINGH ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ६:०३ पूर्वाह्न 
शुरुआत होनी चाहिए… अंजाम भी सामने आएगा

अशोक बजाज ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ७:२९ पूर्वाह्न 
अन्ना बनने की तमन्ना है आपको .

: केवल राम : ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ८:१३ पूर्वाह्न 
“वक्त आ गया है देश के मतदाता को जागना होगा। अपने मतदान से बिना किसी प्रलोभन के ईमानदार सद्चरित्र व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुनें। अगर हम रिश्वत नहीं देगें तो लेना वाला कहाँ से लेगा, काम तो देर सबेर होगा ही।”

इन पंक्तियों पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है ..और अगर समय रहते इन पर विचार किया होता तो आज यह हालात पैदा नहीं होते ….!

ajit gupta ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ९:१८ पूर्वाह्न 
समाज जागृत हो रहा है, उसे भ्रष्‍टाचार का मर्म समझ आएगा। कानून पुख्‍ता हों और जनता यह सोच ले कि हम स्‍वयं रिश्‍वत ना देंगे और ना लेंगे तो बहुत सारी समस्‍याएं सुलझ सकती हैं।

दर्शन कौर’ दर्शी ‘ ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ९:५३ पूर्वाह्न 
बात तो पते की हैं ..कल अन्ना ने कहा की ‘ बहने जागरूक हो और अपने घर में आई हुई एक भी एक्स्ट्रा काली कमाई को स्वीकार न करे ‘ मेरा भी यही मत हैं ? कुछ तो भ्रष्टाचार कम होगा !
लेंन -देंन प्रक्रिया जब तक बंद नही होगी ..भ्रष्टाचार उन्मूलन होना संभव ही नही हें …

वाणी गीत ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ १०:१४ पूर्वाह्न 
समस्या पुरानी है , जिम्मेदार हम सब सुविधाभोगी , मगर जब जागो तभी सवेरा !

anshumala ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ११:१४ पूर्वाह्न 
खुद को सुधारने के साथ दूसरो को भी सुधारना जरुरी है अब तक तो सो रहे थे इसलिए अब काम दुगना और दो तरफ़ा भी हमें ही करना होगा |

दीपक बाबा ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ११:५१ पूर्वाह्न 
तु भी अन्ना ..
मैं अन्ना..
मोहल्ला अन्ना..
गाँव अन्ना..
जिला अन्ना..
राज्य अन्ना…

अब देश अन्ना..

सरकार सोच सोच परेशान.
क्या करें अब – यूँ तनहा..

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ १२:०१ अपराह्न 
बहुत सही लिखा है आपने…

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ १२:१६ अपराह्न 
भ्रष्टाचार से मिली पीड़ा आज व्यक्त हो रही है।

S.M.HABIB ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ४:४१ अपराह्न 
मैं भी अन्ना, तु भी है, अन्ना सारा देश.
रह पाए ना एक भी, भ्रष्टाचारी शेष.

संध्या शर्मा ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ८:१३ अपराह्न 
आपके विचार बहुत अच्छे हैं अब देखते हैं क्या होता है, कहाँ तक और कौन कम करता है इस भ्रष्टाचार को…

रेखा ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ८:४१ अपराह्न 
लोगों की दबी हुई भावनाएं उजागर हो रही है आज -कल….शुरुआत तो हो कहीं से …

शरद कोकास ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ ९:२१ अपराह्न 
ताकि सनद रहे वक़्त पर काम आये ।

Rahul Singh ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ १०:१० अपराह्न 
बेहतरी की उम्‍मीद.

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

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 २० अगस्त २०११ १०:५३ अपराह्न 
जब तक सांस तब तक आस । आशा पर तो दुनिया टिकी है ।

सुनीता शानू ने कहा… 

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 २१ अगस्त २०११ ८:३७ पूर्वाह्न 
क्या आप खुद को ढूँढ पाये हैं आज की नई पुरानी हलचल में:)

Khushdeep Sehgal ने कहा… 

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 २१ अगस्त २०११ ९:०२ पूर्वाह्न 
रामलीला मैदान में ये नारे लगते भी देखे जा सकते हैं…

ज़ोर से बोलो…आगे वाले भी बोलें…पीछे वाले भी बोलें…अरे सारे बोलें…

जय अन्ना की…

जय हिंद…

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

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 २१ अगस्त २०११ ११:४४ पूर्वाह्न 
भ्रष्टाचार के प्रति मन में दबा आक्रोश लावा बन का फूट रहा है …कुछ तो परिणाम सकारात्मक हो .

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

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 २१ अगस्त २०११ २:३१ अपराह्न 
भ्रष्टाचार मिटाना है तो शुरुआत खुद से करनी पड़ेगी ।
सोचना चाहिए कि क्या हमें अन्ना कहलाने का अधिकार है ।

anu ने कहा… 

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 २१ अगस्त २०११ ६:५२ अपराह्न 
इस वक़्त पूरी दिल्ली के साथ साथ … समस्त भारत अन्ना मय हो गया है …..छा गए है अन्ना जी

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अगस्त 30, 2011 at 3:30 अपराह्न टिप्पणी करे

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