लोक देवता गुगापीर

अगस्त 30, 2011 at 3:34 अपराह्न टिप्पणी करे

ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, २३ अगस्त २०११

 

गुगादेव, गोगापीर, जहरपीर
बात 1987 के अगस्त माह की है, उन दिनों रायपुर से दिल्ली के बीच सीधी ट्रेन 36गढ एक्सप्रेस ही चलती थी। दिल्ली से इसका रायपुर वापसी का समय भोर में ही था। इसलिए देर रात तक प्लेटफ़ार्म में पहुंच कर ट्रेन का इंतजार करना ही पड़ता था। सो मैं भी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। उस दिन स्टेशन में बहुत भीड़ थी। पीत वस्त्रधारियों का रेलम-पेल था। स्टेशन में तिल धरने की भी जगह नहीं। जो भी ट्रेन आती थी ये उसमें बाल-बच्चों समेत घुस जाते थे। पटरियों पर शौचादि से भी भीड़ को परहेज नहीं था। कुल मिलाकर भीड़ की अराजकता वैसे ही चारों ओर दिखाई दे रही थी,  जैसे किसी मेले-ठेले के समय होती है। मुझे भी जिज्ञासा हुई कि ये सब एक ही गणवेश में कहाँ जा रहे हैं? पुछने पर पता चला कि भीड़ गुगा के मेले में गुगामैड़ी जा रही है। अब गुगामैड़ी भूगोल में कहाँ पर है और ऐसा क्या विशेष है वहाँ जो लोग ट्रेन की छतों पर भी सवार हो कर जा रहे हैं। कई सवाल दिमाग में चल रहे थे। तब मैने राजस्थान का अधिक सफ़र नहीं किया था, नही अधिक जानकारी रखता था। लेकिन गुगापीर के विषय में सुना था।
आज गुगानवमी है, आज के ही दिन गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वंश के शासक जैबर (जेवरसिंह) की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था। लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। यह गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है। गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान है। इन्हे हिन्दु गुगादेव, गुगापीर के नाम से मानते हैं और उत्तर प्रदेश में जाहर पीर और मुसलमान गोगापीर कहते हैं। दोनो धर्मों के लोग इनको समान रुप से मानते हैं।
गोगादेव के जन्मस्थान ददरेवा, जो राजस्थान के चुरू जिले की राजगढ़ तहसील में स्थित है। यहाँ पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं। नाथ परम्परा के साधुओं के ‍लिए यह स्थान बहुत महत्व रखता है। दूसरी ओर कायमखानी मुस्लिम समाज के लोग उनको जाहर पीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मत्‍था टेकने और मन्नत माँगने आते हैं। इस तरह यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है।मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। लोक देवता जाहर पीर गोगाजी की जन्मस्थली ददरेवा में भादवा मास के दौरान लगने वाले मेले के दृष्टिगत पंचमी (सोमवार) को श्रद्धालुओं की संख्या में प्रतिवर्ष वृद्धि होती है। मेले में राजस्थान के अलावा पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, हिमाचाल व गुजरात सहित विभिन्न प्रांतों से श्रद्धालु पहुंचते हैं एवं अपनी मन्नत मानते हैं।
कहते हैं कि गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा बने। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले पर मस्जिदनुमा बना हुआ है, इसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला का बोध कराती हैं। कहा जाता है कि फिरोजशाह तुगलक सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक व उसकी सेना ने एक चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना आ रही है। तुगलक की सेना में हाहाकार मच गया। तुगलक की सेना के साथ आए धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान सिद्ध है जो प्रकट होना चाहता है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते समय गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया।
गोगादेव का विवाह कोलुमण्ड की राजकुमारी केलमदे के साथ होना तय हुआ था किन्तु विवाह होने से पहले ही केलमदे को एक सांप ने डस लिया. इससे गोगाजी कुपित हो गए और मन्त्र पढ़ने लगे. मन्त्र की शक्ति से नाग तेल की कढाई में आकर मरने लगे. तब नागों के राजा ने आकर गोगाजी से माफ़ी मांगी तथा केलमदे का जहर चूस लिया. इस पर गोगाजी शांत हो गए। जब गजनी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया था तब पश्चिमी राजस्थान में गोगा ने ही गजनी का रास्ता रोका था. घमासान युद्ध हुआ. गोगा ने अपने सभी पुत्रों, भतीजों, भांजों व अनेक रिश्तेदारों सहित जन्म भूमि और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दे दिया।
गोगापीर की समाधि पर हिन्दु एवं मुस्लिम पुजारी
जिस स्थान पर उनका शरीर गिरा था उसे गोगामेडी कहते हैं. हनुमानगढ़ जिले के नोहर उपखंड में स्थित गोगाजी के पावन धाम गोगामेड़ी स्थित गोगाजी का समाधि स्थल जन्म स्थान से लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है, जो साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक है, जहाँ एक हिन्दू व एक मुस्लिम पुजारी खड़े रहते हैं। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगा मेड़ी के मेले में वीर गोगाजी की समाधि तथा गोरखटीला स्थित गुरु गोरक्षनाथ के धूने पर शीश भक्तजन शीश नवाते हैं।कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन नवमी को गुगापीर का जन्मदिन मनाया जाता है। लोक देवता के रुप में स्थापित गुगापीर की पुजा की जाती है। पूजा स्थान की दीवार पर मांडना बनाया जाता है फ़िर उसी को धूप दीप दिखाकर खीर-लापसी का भोग लगाया जाता है। वैसे इस पर्व की हरिजनों (चूहड़ा समाज) में अधिक मान्यता है, पर सभी जातियाँ गुगापीर को मानती है और इनके जन्मदिवस को लोकपर्व के रुप में मनाती हैं।

NH-30 सड़क गंगा की सैर — जाटलैंड से साभार

 

COMMENTS :

23 टिप्पणियाँ to “लोक देवता गुगापीर —- ललित शर्मा”

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ६:१३ पूर्वाह्न 
बचपन से कुम्हार से माटी के गुगाजी लाकर यह पूजा करते आ रहे हैं …इतनी जानकारी आज मिली है…. आभार यह लेख पढवाने का …..

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ७:२१ पूर्वाह्न 
मिट्टी के छोटे छोटे गोगाजी की पूजा होते देखा किये हमेशा , आपने पूरा इतिहास ही बता दिया …
सांप्रदायिक सदभाव की मिसाल है यह परंपरा और त्यौहार !

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ७:२७ पूर्वाह्न 
गोगा जी के बारे में जानकारी देने के लिए आभार ! बचपन में गांव में गोगा जी की साल में एक बार पूजा होते हुए देखा करते थे उस दिन कुम्हार गोगा जी की मिट्टी की बनी प्रतिमाए घर देकर जाते थे उसी प्रतिमा की पूजा होती थी लेकिन हमें तो उस दिन बनने वाले गुलगुलों को खाने से मतलब रहता था ! गोगा जी के बारे में सुना तो खूब है लेकिन इतने दिनों में आज पहली बार इतनी जानकारी मिल पाई है |
एक पुस्तक में मिली जानकारी के अनुसार गोगा जी सन् १२९६ में फिरोजशाह से युद्ध करते हुए देवलोक हुए थे |
राजस्थान के लोक देवताओं में गोगा जी अग्रणी स्थान है और राजस्थान में प्रसिद्ध पांचो पीरो में से एक है |

कायमखानी मुसलमान गोगाजी के ही वंशज है|

राजस्थान के लोक देवता श्री गोगा जी चौहान | Rajput World

-सर्जना शर्मा- ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ७:५३ पूर्वाह्न 
ललित जी जन्माष्टमी और गुगानवमी पर्व पर शुभकामनाएं । जाहरवीर गुगा पीर को ज्यादातर हरिजन पूजते हैं । इस पर मुझे कुछ संदेंह है । क्योंकि मैनें तो बचपन से अपने घर में और अपने पास सबको गुगानवमी की पूजा करते देखा है । सब जातियों और वर्णों के लोग उनकी पूजा करते हैं । विशेषकर उत्तर भारत में राजस्थान में ।

सतीश सक्सेना ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:०९ पूर्वाह्न 
नयी जानकारी के लिए आभार !

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:१३ पूर्वाह्न 
@सर्जना जी कुछ लिंक देखिए—ऐसा कहा जाता है कि एक राजपूत राजा थे जिनका नाम जेवर था। उनकी रानी का नाम बाचल था। रानी लंबे समय से संतानहीनता का दंश रही थी, को एक साधु ने आर्शीवाद के साथ गोगल (सांप के जहर से बना लुगदीनुमा मणी जैसा) भी दिया। उस रानी ने इस गोगल के पांच भाग किए तथा चार भाग अपनी सेविकाओं को भी दे दिया जो संतानहीन थी। उनमें से एक भाग मेंहतरानी (चुहड़ी) को तथा एक टुकड़ा घोड़ी को भी दिया। एक भाग स्वयं रानी ने भी खाया। रानी से जो पुत्र पैदा हुआ वह गागापीर कहलाए। कहीं-कहीं इन्हें गोगावीर भी कहते हैं। जो पुत्र मेहतरानी से हुआ वे रत्नाजी चावरिया कहलाए चूंकि गोगल के रिश्ते से दोनों भाई थे। इसलिए चूहड़ा समाज के लोगों ने इन पर विशेष श्रद्धा दिखाई।

http://www.3dsyndication.com/dainik_bhaskar_hindi_news_features/Religion%20&%20Spirituality/DBHIM4001

http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/817/3/0

दर्शन कौर’ दर्शी ‘ ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:२० पूर्वाह्न 
बचपन में माँ के मुंह से सुनते थे — ‘गोगा -नवमी ‘ ! और रात को हरिजन लोगो की बस्ती से निकलती थी शोभायात्रा ! जिसे ‘ इंदौर’ में ‘छड़ी ‘ कहा जाता हैं …बहुत जोरशोर से निकलती थी यह शोभायात्रा!

गोगाजी की कहानियां ‘ कठपुतली ‘ वाले भी अपनी कला में दिखाते हैं ?

S.M.HABIB (Sanjay Mishra ‘Habib’) ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:२३ पूर्वाह्न 
बहुत उल्लेखनीय जानकारी समेटे लेख… सुन्दर चित्रण…
सादर बधाई…

ali ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:३७ पूर्वाह्न 
ललित जी ,
रतन सिंह शेखावत जी की टिप्पणी में एक शब्द ‘साल’ ( गोगा जी की साल ) का उल्लेख है ! मंडोर , जोधपुर घूमते वक़्त ‘देवताओं की साल’ देखी थी !
हमारे घर गाय कोठे को साल कहते हैं और फिर घुड़साल भी सुना है ! उत्सुकता यह है कि यह शब्द मूलतः किस भाषा का है ? क्या यह सिर्फ आश्रय स्थल के आशय में ही प्रयुक्त होता है ? इसके अतिरिक्त और जो भी जानकारी आप दे सकें !

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ८:५८ पूर्वाह्न 
पहली बार गोगाजी के बारे में इतनी सारी जानकारी मिली .. बढिया ज्ञानवर्द्धक आलेख !!

Indranil Bhattacharjee ………”सैल” ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ९:०१ पूर्वाह्न 
बहुत बढ़िया जानकारी मिली … धन्यवाद !

Murari Pareek ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ९:३७ पूर्वाह्न 
गोगाजी के बारे में इतना कुछ नहीं सूना था| पर विस्तार से आपने बताया वैसे हमारे गांव गोगासर को गोगीजी ने ही बसाया था ! उन्ही के नाम पर गाँव का नाम “गोगासर” पड़ा|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ११:२० पूर्वाह्न 
आज 23 – 08 – 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है …..

…आज के कुछ खास चिट्ठे …आपकी नज़र .तेताला पर 
____________________________________

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १२:२१ अपराह्न 
हाँ पंडित जी, आज गूगेबाबे (हम यही कहते हैं) का मेला है गाँव में … बचपन से देखते आ रहे हैं …. पर इतिहास आज पता चला… यही मानते थे.. कि ये नाग के देवता है.. और इनकी पूजा करने से नाग कुछ नहीं कहते..

भंगी ही सबसे पहले गुगा बाबा के झंडे के साथ जाते हैं… और हाँ.. गुलगुले का प्रसाद.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १:०७ अपराह्न 
नयी जानकारी मिली …आभार

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ३:०३ अपराह्न 
बहुत अच्छी जानकारी…

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ ३:५२ अपराह्न 
रोचक और सार्थक जानकारी

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १०:१५ अपराह्न 
नई जानकारी देने के लिए आभार .

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 २३ अगस्त २०११ १०:५६ अपराह्न 
रोचक जानकारी देने के लिए आभार…

anu ने कहा… 

on 

 २४ अगस्त २०११ १२:०२ अपराह्न 
भाई जी आपके लेख पढने के बाद ऐसा लगता है कि जैसे मै ज्ञान के मामले में बिलकुल खाली हूँ …..आभार जो आप नई नई जानकारी से हम सबको आवगत करवाते है ……

anu

rightbooks86 ने कहा… 

on 

 २४ अगस्त २०११ १२:५९ अपराह्न 
The visit was useful. Content was really very informative. From http://www.rightbooks.in

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 २४ अगस्त २०११ ९:१२ अपराह्न 
यह नाम अन्‍य क्षेत्रों में जेवीजी (जै वीर गोगाजी) कंपनी के कारण अधिक प्रसिद्ध हुआ था.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 २५ अगस्त २०११ २:२७ अपराह्न 
इतिहास की गाथाओं में छिपा परम्पराओं का मूल।

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_23.html

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