मिस्टर टेटकू राम! स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन

अगस्त 30, 2011 at 3:15 अपराह्न टिप्पणी करे

ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, ६ अगस्त २०११

 

छत्तीसगढी फ़िल्म उद्योग छालीवुड के नाम से पहचाना जाता है, छालीवुड नाम की पहचान बनाने में “मोर छंइया भुंईया” नामक फ़िल्म की महती भूमिका है। नए राज्य छत्तीसगढ के निर्माण के साथ ही इस फ़िल्म का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ और इसने सफ़लता के झंडे गाड़ दिए। इस फ़िल्म ने अनुज शर्मा की मुख्य अभिनेता के रुप में पहचान बनाई। फ़िल्म के निर्देशक सतीश जैन थे, फ़िल्म के गीत भी कर्णप्रिय थे। इस फ़िल्म की सफ़लता के पश्चात छालीवुड में फ़िल्म निर्माण का सिलसिला प्रारंभ हो गया। मनु नायक की “कहि देबे संदेश” जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म की असफ़लता के पश्चात छत्तीसगढी भाषा की फ़िल्मे एक लम्बे समय से बनना ही बंद हो गयी थी। मृतप्राय सी छत्तीसगढी फ़िल्मकारों की आशाओं को “मोर छंइया भुंईया” ने एकाएक जगा दिया। सन 2000 से लेकर 2010 तक छालीवुड ने एक लम्बा सफ़र तय किया। फ़िल्म निर्माण की तरफ़ लोगों का ध्यान खींचा एवं टाकीजों से मुंह मोड़ चुके दर्शक पुन: फ़िल्म देखने के लिए टाकीजों की तरफ़ चल पड़े।
फ़िल्म  का एक सीन
छालीवुड में बाक्स ऑफ़िस पर भीड़ जुटाने छत्तीसगढी फ़िल्में कामयाब रही। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का भरपुर मौका मिला। रंगमंच से जुड़े कलाकार भी सुनहले पर्दे पर दिखाई देने लगे। उनकी भी पूछ परख होने लगी। दस वर्ष के सफ़र के पश्चात छालीवुड में फ़्लाप फ़िल्में आने लगी। लगा कि गाड़ी पटरी से उतर रही है। इसी दौरान अनुज शर्मा ने अभिनय के साथ फ़िल्म निर्माण का फ़ैसला लिया और मनोज वर्मा के निर्देशन में महत्वाकांक्षी फ़िल्म मिस्टर टेटकूराम बना डाली। इस फ़िल्म के कुछ गानों की शुटिंग प्रदेश से बाहर जाकर हिमाचल की सुरम्य वादियों में की। शायद यह पहला मौका था जब छत्तीसगढी कलाकार प्रदेश के बाहर जाकर किसी  अन्य लोकेशन पर फ़िल्म की शुटिंग कर रहे थे। इसकी सूचना कुछ मित्रों से मिली थी। मिस्टर टेटकू राम का प्रीमियर शो 5 अगस्त को प्रभात टाकीज में हुआ। प्रीमियर शो देख कर निकले दर्शकों ने फ़िल्म की भूरि-भुरि प्रशंसा की।
पुष्पेन्द्र सिंह (फ़त्ते) और ललित शर्मा
इस फ़िल्म की प्यार एवं हास्य मिश्रित पटकथा अच्छी बन पड़ी है। फ़िल्म में अनुज शर्मा ने टेटकू राम, पुष्पेंद्र सिंह ने मकान मालिक फ़त्ते, पूजा साहू ने टुनकी, शिवकुमार दीपक ने दादा, हेमलाल कौशल ने टॉमी, संजय महानंद ने गुग्गी, आशीष शेंद्रे ने टेटकू राम के पिता की भूमिका निभाई है। फ़िल्म की कहानी मकान, मकान मालिक एवं किराएदारों के ईर्द-गिर्द ही घूमती है। फ़त्ते के मकान में कुछ किराएदार रहते हैं, जिसमें टेट्कूराम नगर निगम में अधिकारी के पद पर कार्यरत है, इसे एक रेड़ियो जॉकी की आवाज इतनी मधूर लगती है कि आवाज सुनकर उससे प्यार पींगे बढाने लगता है, फ़त्ते की लड़की अपने बाप से छिपकर रेड़ियो जॉकी का काम करती है। गाजा बजाना फ़त्ते को पसंद नहीं है, इसकी बड़ी लड़की ने एक तबला वादक से विवाह कर लिया, तब से फ़त्ते उससे नाराज होकर संबंध तोड़ चुका है। टुनकी अपने पिता के सगीत विरोधी होने के कारण उसे स्कूल में काम करना बताती है। घर में रहने वाले किसी किराएदार को टुनकी के कार्य के विषय में जानकारी नहीं होती।
संजय महानंद (गुघ्गी)
फ़िल्म में छत्तीसगढ में किसानों की जमीन बिल्डरों द्वारा खरीदे जाने पर भी गहरा कटाक्ष किया है। गुघ्गी एक जमीन दलाल है और वह फ़त्ते के मकान की जमीन पर नजर गड़ाए रहता है। उसका एकमात्र ध्येय किसी तरह फ़त्ते की जमीन खरीदना रहता है, वह उसे रुपए का लालच देता है, लेकिन फ़त्ते मकान बेचना स्वीकार नहीं करता और उसे घर से भगा देता है। इसी बीच टेटकू राम की मोबाईल बातचीत रेड़ियो जॉकी से होती है। जब वह उससे नाम पूछती है तो उसे अपना नाम टेटकू राम बताने में शर्म आती है। वह नाम नहीं बताता, टॉमी की सलाह से टेटकू राम से शार्ट नेम लगा कर टी.आर.साहू हो जाता है। अपने माँ-बाप से नाम के विषय में पूछता है तो उसकी माँ बताती है कि उसके बच्चे जन्म लेने के बाद नहीं रहते थे इसलिए इस बच्चे का नाम टोटका स्वरुप टेटकू राम रख दिया। फ़त्ते और टेटकू राम का बाप टुनकी और टेटकू का रिश्ता आपस में तय कर देते हैं। जिससे टेटकू राम एवं टुनकी दोनो नकार देते हैं। क्योंकि टेट्कू नहीं जानता था कि टुनकी ही रेड़ियो जॉकी है और टुनकी नहीं जानती थी कि जिस मोबाईल कॉल वाले लड़के से प्यार की पींगे बढा रही है वह और कोई नहीं टेटकूराम ही है।
अनुज शर्मा और हेमलाल यादव
एक दिन टुनकी और टेटकू मिलकर एक दुसरे के विषय में जान जाते हैं। इसी बीच किराएदारों में शामिल दादा के पोते की तबियत खराब होने के कारण उसे अस्पताल में दाखिल कराया जाता है, तब टेटकू अपने पिता से कहके गाँव चला जाता है और फ़त्ते अपना घर गुग्गी को बेच देता है। इससे सारे किराएदार उसे लानत-मलानत भेजते हैं, भला-बुरा कहते हैं। तभी टेटकू सबको आकर बताता है कि दादा के पोते की किडनी खराब हो गयी है और उसके इलाज के लिए ही फ़त्ते ने अपना मकान बेच दिया है। वह कहता है कि उसने डाक्टर को रुपए चुका दिए हैं अब मकान बेचने की आवश्यकता नहीं है। टेटकू गाँव का मकान बेचकर बच्चे की जान बचाने का संवेदनात्मक मानवीय पक्ष उजागर करता है। गुग्गी को रुपए वापस कर देते हैं तो उसे यह नागवार गुजरता है। इसके बाद फ़िल्म बंबईया मसाला फ़िल्मों जैसे क्लाईमैक्स की ओर बढ जाती है। अंत में ढिसुम-ढिसुम के पश्चात फ़त्ते अपनी लड़की टुनकी का हाथ टेटकू राम के हाथ में दे देता है। फ़िल्म अपनी गति की ओर बढ जाती है।
पूजा साहू
जहाँ अनुज शर्मा के अभिनय में परिपक्वता है, वहाँ फ़त्ते के रुप में पुष्पेंद्र सिंह का सशक्त अभिनय है, संवाद के साथ चेहरे के हाव-भाव मेल खाते हैं, इनके अभिनय में रंगमंच के मंजे हुए कलाकार की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। नायिका की दोहरी भूमिका में पूजा साहू का अभिनय ठीक रहा। टामी का पात्र निभाने वाले हेमलाल कौशल का प्ले मैने देखा था, उस दिन लगा था कि इसका चेहरा-मोहरा राजपाल यादव से मिलता जुलता है। वैसी भूमिका इसने फ़िल्म में भी निभाई है।  गुग्गी के रुप में संजय महानंद ने पंजाबी भाषा का छत्तीसगढी के साथ मिश्रण करके उम्दा हास्य संवाद प्रस्तुत किया। शिव कुमार दीपक ने वृद्ध दादा की भूमिका अच्छे से निभाई। उपासना वैष्णव एवं बाल कलाकर आयुष का भी प्रदर्शन बेहतरीन रहा। आशीष शेंद्रे ने भी टेटकूराम के पिता की भूमिका में कोई कसर नहीं छोड़ी। फ़िल्म निर्देशन भी अच्छा है।फ़िल्म में टायटिल सांग प्रयोग किया गया है।
पुष्पेन्द्र सिंह फ़त्ते की भू्मिका में
सुनील सोनी के संगीत के साथ मशहूर छत्तीसगढी गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया एवं कुबेर गीतपरिहा ने.गीत लिखे हैं, गीतों को स्वर सुनील सोनी, अलका चंद्राकर, विजया राऊत एवं अनुज शर्मा ने दिया तथा फ़िल्मांकन दिनेश ठक्कर ने किया है। कुछ गीत धूम मचा सकते हैं। कुल मिलाकर फ़िल्म में वह सब मसाला है जिससे फ़िल्म चला करती है। चुटीले हास्य के साथ प्रेम कहानी का उम्दा प्रयोग किया है। स्वस्थ मनोरंजन से भरपुर परिवार के साथ बैठकर देखने लायक फ़िल्म है। आशा है मिस्टर टेटकूराम एक सफ़ल फ़िल्म साबित होगी तथा 2011 में मील का पत्थर बनकर छालीवुड को फ़्लाप फ़िल्मों के दौर से बाहर लेकर आएगी।  भरपुर हास्य का मजा लेना है तो एक फ़िल्म देखें। अभ्युदय इंटरटेनमेंट एवं शर्मा एवं वर्मा की समस्त टीम की हार्दिक शुभकामनाएं। फ़िल्म का प्रोमो यहाँ पर देखें

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

23 टिप्पणियाँ to “मिस्टर टेटकू राम! स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन — ललित शर्मा”

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ६:२६ पूर्वाह्न 
वाह जी ! बढ़िया लगी फिल्म समीक्षा |
way4host

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ७:१४ पूर्वाह्न 
फिल्‍म की पटकथा अच्‍छी लगी .. आपने बढिया विश्‍लेषण भी किया है .. अभ्युदय इंटरटेनमेंट सहित फिल्‍म्‍ की समस्त टीम को हार्दिक शुभकामनाएं !!

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:०३ पूर्वाह्न 
चित्रों से लापतागंज जैसा माहौल नजर आ रहा है …
रोचक समीक्षा !

Udan Tashtari ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:३४ पूर्वाह्न 
रोचक!!

हेमन्‍त वैष्‍णव ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:५२ पूर्वाह्न 
सिनेमा के बारे में सोचना और बनाना, दो अलग-अलग काम है। ज्या दातर लोग पहला वाला काम करते हैं। मिस्टर टेटकू राम के निर्देशक मनोज वर्मा जी सोचने और करने के फासले को मिटा दिए। छत्तीसगढ़ के लोककलाकारों को शुरू से अन्त तक सिनेमाई अनुशासन में बांधकर बेहतर अभिनय कराने में कामयाबी बेहतर निर्देशक साबित हुए । फत्ते की भूमिका में पूरे फिल्म के अन्त तक किरदार को ना पहचान पाना खुद के लिए जीवन्त अभिनय की अनूठी मिसाल साबित हूए पुष्पेन्द्र् जी , बगैर बिखराव पूरे फिल्म में दर्शको को बांधकर रखने जो निरन्तरता होनी चाहिए वो दिखे इस फिल्म में, ध्वन्याकन में छत्तीसगढि़या लहजा ध्यान में रखा जाना प्रंशसनीय है जो कई फिल्मो में चुक गया है । बर्फीली वादियो में छत्तीसगढ़ी गीतो का देखना सुनना भाता है वही संवाद और दृश्य में मिटटी की खूशबु है अंत में ढिसुम-ढिसुम की अवधि थोड़ा कम होना था ।
चलते चलते हास्य बोध–6 मंजिला मिलेट्री हेडक्वाटर में आग लग जाती है, ब्रिगेडियर के आदेश से आनन फ़ानन में बिल्डिंग के बाहर जाल तान कर सिपाही खड़े हो जाते है, छत से फ़ौजी जाल में कूदना प्रारंभ करते हैं। सिपाही से लेकर हवलदार तक सब कूद जाते हैं और उनकी जान बच जाती है। जैसे ही ब्रिग्रेडियर साहब सावधान करके बिल्डिंग से छलांग लगाते हैं वैसे ही जाल पकड़ने वाले सिपाही, जाल छोड़ कर उन्हे सैल्युट दे देते हैं। जैसे पीछे की पंक्ति से आता हुआ समोसा पहली पंक्ति तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देता है दुर्भाग्य से पहली पंक्ति में ललित भैया के साथ मैं विराजमान था
कुल मिलाके ए फिलिम एकदम झम हे….. मां कसम

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ८:५४ पूर्वाह्न 
पुराने दिनों में अपने साथियों से ईर्ष्‍या होती थी, जो फिल्‍म हमसे पहले देख ले और स्‍टोरी सुना डाले, सुनते भी थे चाव से लेकिन कोसते थे कि इसने पहले क्‍यों देख ली और हमने अब तक क्‍यों नहीं देखी.

Murari Pareek ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:३० पूर्वाह्न 
badhiyaa!! tetku raam dhamaal macha de yahi kamnaa hai!!

Raviratlami ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:४३ पूर्वाह्न 
ए फिलिम ल त देखे ल पड़ही लगथे ददा. एखर डीवीडी जारी हो गे हे का? काबर कि ए तरफ त ये फिलिम रिलीज नइ होही…

SHAKUNTALA ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:४७ पूर्वाह्न 
मैंने समीक्षा लगातार दो बार पढ़ ली अनुज वास्तव में प्रतिभाशाली कलाकार है .समीक्षा पढ़कर मन में उत्कंठा है की कब मैं यह फ़िल्म देखने जाऊं

महेन्द्र मिश्र ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ १२:२७ अपराह्न 
vaah ,,anand aa gaya rochak prastuti..

रविन्‍द्र पुंज ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ १२:३६ अपराह्न 
बहुत बडिया।
लेकिन
आपके नेटवर्कड ब्‍लॉग को फोलो करने पर यह मैसेज आ रहा है:
Blog does not exist.
If you have changed the name of your blog after installing the widget, then please re-install the widget to get the updated link.
कृप्‍या अपडेट करें। धन्‍यवाद सहित।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ १:२८ अपराह्न 
महत प्रयास के लिये सभी को बधाई और शुभकामनायें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ३:१२ अपराह्न 
आपकी नज़र से देख ली यह फिल्म .. अच्छी समीक्षा

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ४:३६ अपराह्न 
अनुज बहुत अच्छे व प्रतिभाशाली कलाकार हैं… अच्छी फिल्म समीक्षा…शुभकामनायें

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ५:५० अपराह्न 
एगो भूमिका आप भी निभा लेते…. छालीवुड के हीरो – पं० ललित शर्मा… 🙂

वैसे आइडिया बुरा नहीं है सरजी

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali ‘Rajnish’) ने कहा… 

on 

 ६ अगस्त २०११ ९:३१ अपराह्न 
जरा सी खरोंच लगते ही दिल पे लगे उभर उभर आते हैं।

——
कम्‍प्‍यूटर से तेज़!
इस दर्द की दवा क्‍या है….

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ १२:०३ पूर्वाह्न 
अच्छा तो आप फिल्म समीक्षक कब से बन गए ?

सुनीता शानू ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ७:३८ पूर्वाह्न 
चर्चा में आज नई पुरानी हलचल

Smart Indian – स्मार्ट इंडियन ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ८:२१ पूर्वाह्न 
क्षेत्रीय सिनेमा की सचित्र समीक्षा पसन्द आयी।

Khushdeep Sehgal ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ८:२४ पूर्वाह्न 
ललित भाई के लीड रोल वाली अगली फिल्म का टाइटल…

फौजी छत्तीसगढ़िया…

जय हिंद…

mahendra verma ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ९:४५ पूर्वाह्न 
फिल्म की अच्छी समीक्षा पढ़कर इसे देखने का मन हो रहा है।
फिल्म की सफलता के लिए शुभकामनाएं।

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ १०:१४ अपराह्न 
फ़िल्मवा कैसी रहलवा ,

भारतीय नागरिक – Indian Citizen ने कहा… 

on 

 ७ अगस्त २०११ ११:१४ अपराह्न 
मजेदार लगती है आपकी समीक्षा पढ़कर तो..

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_06.html

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मि. टेटकू राम फ़र्जी डॉक्टरों से बचके रे बाबा

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