फ़र्जी डॉक्टरों से बचके रे बाबा

अगस्त 30, 2011 at 3:18 अपराह्न टिप्पणी करे

ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, ८ अगस्त २०११

 

डॉक्टर शब्द वैसे ही माननीय और सम्माननीय है जैसे किसी जमाने में वैद्य, वैद्यराज, हकीम शब्द हुआ करते थे। आज से 25 वर्ष पहले यदि कोई बीमार हो जाता था तो डॉक्टर को बुलाने पर उसका बैग (पेटी) भी उठाकर लाना पड़ता था। उसकी डिग्री कोई नहीं देखता था, बस बीमार ठीक होना चाहिए, लोग यही चाहते थे। कौन एम बी बी एस, कौन बी ए एम एस कौन आर एम पी है। इससे कोई मतलब नहीं था। हमारे गाँव का आर एम पी डॉक्टर खाट खड़ी करके उसके पाए में ग्लुकोश की बोतल लटका कर नीम के पेड़ के नीचे ही मरीज को चढा देता था। दो चार गोली और इंजेक्शन दिए फ़िर अगले गाँव को प्रस्थान कर जाता था। इन डॉक्टरों में फ़र्क ही नहीं मालूम होता था। जब हाई स्कूल में पढने लगे तब पता चला कि कितने तरह की चिकित्सा पद्धतियां हैं और कितने तरह के डॉक्टर हैं। एक ऐसा भी डॉक्टर सुना जो इलाज नहीं करता फ़िर भी डॉक्टर हैं। हम तो यही समझते थे कि जिसका भी नाम डॉक्टर वही इलाज करता है। इस नए प्रकार के डॉक्टर को पी एच डी डॉक्टर कहते हैं।

आज एक डॉक्टर बनाना इतना मंहगा हो गया है कि सिर्फ़ करोड़पति लोग ही अपने बच्चे को डॉक्टर बना सकते हैं। मेरे मित्र के बच्चे को पी एम टी में सरकारी सीट नहीं मिली तो बच्चे को उसने प्रायवेट मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलवाया। हिसाब लगाने पर पता चला कि जब वह एम बी बी एस की डिग्री लेकर कॉलेज से पास आऊट होगा तब तक उसके 32 लाख रुपए खर्च हो जाएगें। यह आंकड़ा तीन साल पहले का है। इंजीनियरिंग में बी ई करने के लिए एक सैमेस्टर का खर्च 80 हजार से 1 लाख रुपए है। सरकारी कालेजो ने भी अपनी फ़ीस बढा दी है। चिकित्सा शिक्षा एवं तकनीकि शिक्षा इतनी मंहगी हो गयी है कि आम आदमी के बस के बाहर की बात है। जबकि आज भी देश में चिकित्सकों की कमी है। ग्रामीण अंचलों में चिकित्सा सहायता रोगी को समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती और उसके प्राण चले जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीजों का कोई माई बाप नहीं है, इसीलिए लोग प्रायवेट अस्पतालों इलाज कराने को प्राथमिकता देते हैं। जिसकी परिणीति शहरों में खुले हुए बड़े बड़े नर्सिग होम हैं।

हमें अंग्रेजी के गुरु जी कहते थे कि -“डॉक्टर, इंजीनियर,वकील वर हैं, बाकी सब गोबर हैं।” कहने का मतलब था कि अच्छी पढाई करो और इन तीनों में से कुछ बन कर दिखाओ, यही सब योग्य हैं। इनकी ही समाज में प्रतिष्ठा और मान्यता है। हम हाई स्कूल में कला संकाय के विद्यार्थी बन चुके थे, इसलिए डॉक्टर और इंजीनियर बनना की संभावना ही खत्म हो गयी थी। स्कूल में इतने अधिक विषय भी नहीं थे, सिर्फ़ कला और विज्ञान संकाय ही थे, इन दोनो में से चयन करना था। इसलिए कला ही चुन लिया, खेलते कूदते पास हो जाएगें, अधिक मगजमारी नहीं करनी पड़ेगी। कालांतर में डॉक्टर एक जाति ही बन गयी। समाज उच्च शिक्षित एवं प्रतिष्ठित वर्ग तैयार हो गया। बड़े लोग इनके रहन-सहन एवं पहनने ओढने की नकल करते हैं। आज भी लोग अपने बच्चे को सबसे पहले डॉक्टर ही बनाना चाहते हैं। जिनके परिवार में एक एम बी बी एस डॉक्टर हो गया, उसका समाज में रुतबा बढ जाता है।

इस रुतबे को बनाने के लिए पी एच डी का चलन बढ गया। किसी एक विषय या पक्ष को लेकर शोध करने पर पी एच डी डॉक्टर की उपाधि प्रदान की जाती है। पी एच डी रजिस्ट्रेशन से लेकर गाईड ढूंढ कर शोध करना भी एक कठिन कार्य है। गाईड के यहां पानी भरने, उसके बच्चे खिलाने, बाजार से सब्जी लाने, से लेकर समय-समय पर धन-धान्य की दक्षिणा देकर डिग्री पाने तक शोधार्थी का खून सूख जाता है। सदा ध्यान रखना पड़ता है कि कब गाईड का जन्म दिन है, कब उसके बच्चे-बीबी का जन्मदिन है, कब उसकी वैवाहिक वर्षगांठ है, कब उसकी गाय  ने गाँव में बछिया जनी है, कब उसके पिताजी-माताजी की पुण्य तिथि है, कब उसे कहां सम्मानित किया जा रहा है। यह सब याद रखने का तात्पर्य है कि ध्यान रहे कौन सा अवसर भेंट पूजा देने का है। कोई अवसर नहीं चूकना चाहिए, अन्यथा आपकी डिग्री का समय उतना ही बढता जाएगा और आपकी उम्र उतनी ही घटती जाएगी। बताईए एक डॉक्टर की उपाधि के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं।

मेरे साथ के कई लड़के कला संकाय में पढने के बाद अभी गाँव में डॉक्टरी कर रहे हैं। अच्छे नोट छाप रहे हैं। एक दिन मुझे बरसों के बाद सहपाठी पुष्पकुमार मिल गया। मैने उससे पूछा लिया क्या काम कर रहा है? उसने बताया कि वह डॉक्टरी कर रहा है। उसने मोटर सायकिल पर रेडक्रास बनाकर अपना नाम भी लिख रखा था डॉक्टर पुष्पकुमार साहू। मैने उससे पूछा कि डॉक्टरी कब पढ लिया? तो उसने बताया कि वह एक नर्स से शादी करके डॉक्टर हो गया। नर्स से ही कुछ दवाईयों का नाम एवं इंजेक्शन लगाना सीख लिया। वैद्य-विशारद और आयुर्वेद रत्न का सर्टिफ़िकेट जुगाड़ किया और जिस गाँव में नर्स पदस्थ थी वही डिस्पेंसरी खोल ली। धड़ल्ले से डॉक्टर बना घूम रहा है। 32 लाख खर्च करके डॉक्टर बनने की बजाए नर्स से शादी करके डॉक्टर बनने का जुगाड़ सरल और सीधा लगा। सम्बलपुर में एक डॉक्टर की डिग्री देख कर ही दंग रह गया। बरसात के कारण कुछ देर के लिए उसके क्लिनिक में रुकना पड़ा। उसके साईन बोर्ड पे लिखा था डॉक्टर फ़लाँ फ़लाँ बीए, एम ए, एम बी बी एस, एफ़ आई सी आर एम पी। मैने डिग्री के विषय में उससे बात ही नहीं की क्योंकि बारिश में शरण जो ले रखी थी।

नाम के साथ डॉक्टर लिखने के लिए चिकित्सा विज्ञान की 5 साल की पढाई करनी पड़ती है, या शोध करना पड़ता है। लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। तब कहीं जाकर डॉक्टर लिखने की पात्रता हासिल होती है। कोई भी ऐरा-गैरा नीम हकीम फ़र्जी सर्टिफ़िकेट लेकर अपने नाम के साथ डॉक्टर लिखने लग जाता है। जगह-जगह चांदसी दवाखाने खुले हुए हैं, शासन की उदासीनता के कारण लोगों के हौसले बढते जा रहे हैं। नए नए कोर्स पैदा हो रहे हैं, इलेक्ट्रोहोम्योपैथी नामक नयी चिकित्सा पद्धति के प्रास्पेक्टस पर मैने लिखा देखा “कोर्ट से मान्यता प्राप्त”। सोचता रहा कि कोर्ट कब से मेडिकल कौंसिल का काम करने लग गए। इसमें एडमिशन लेने पर 7 हजार (शायद फ़ीस बढ गयी हो) में बी ए एम एस (इलेक्ट्रोहोमियोपैथी) की डिग्री मिलने बाद एलोपैथी चिकित्सा शुरु हो जाती है। सरकार के कानूनों का खुले आम मखौल उड़ाया जा रहा है। नकली डॉक्टरों के द्वारा ठगी करने के मामले अखबारों में पढने मिलते रहते हैं। मरीज को बिना बताए दारु छुड़वाएं, इत्यादि इत्यादि। अखबारों में विज्ञापन देकर ग्राहक फ़ंसाने का कारोबार बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसलिए फ़र्जी डिग्रीधारी डॉक्टरों से बचकर रहने में ही समझदारी है। कहीं जान के लाले न पड़ जाएं। नाम के साथ डॉ लिखने का उपयुक्त कारण न पाए  जाने पर इन्हे जेल भेजा जाना चाहिए।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

 

COMMENTS :

29 टिप्पणियाँ to “फ़र्जी डॉक्टरों से बचके रे बाबा —- ललित शर्मा”

महेन्द्र मिश्र ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ५:३८ पूर्वाह्न 
बच के रहना रे बाबा बच के रहना रे झोलाछाप डाक्टरों से … बिलकुल सही …

सतीश सक्सेना ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ५:५३ पूर्वाह्न 
“32 लाख खर्च करके डॉक्टर बनने की बजाए नर्स से शादी करके डॉक्टर बनने का जुगाड़ सरल और सीधा लगा।”

यह जुगाड़ पसंद आया ललित भाई !
शुभकामनाएं !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ६:२५ पूर्वाह्न 
यह धन्धा उफान पर है।

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ६:२८ पूर्वाह्न 
जुगाड़ कैसे- कैसे !
फर्जी ब्लॉगर्स पर भी प्रकाश डाला जाए किसी पोस्ट में !

पत्रकार-अख्तर खान “अकेला” ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:१६ पूर्वाह्न 
bhaai jo orignal chikitsak hote hain or keval 2 pretishat vaale aarkshan ke chikitsak hote hain unse bhi to mot hi milti hai bahtrin chintan hai bhaijaan lekin ho kahaan in dinon ……akhtar khan akela kota rajsthan

Ratan Singh Shekhawat ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:२७ पूर्वाह्न 
अब तो मेडिकल कालेजें डाक्टर नहीं कसाई पैदा कर रही है|
way4host

Rahul Singh ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:५४ पूर्वाह्न 
सही फरमाया.

भारतीय नागरिक – Indian Citizen ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ८:२७ पूर्वाह्न 
garib ke liye to yahi mil sakte hain..

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ८:३१ पूर्वाह्न 
सच में सतर्क रहना ज़रूरी है….

Arunesh c dave ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ९:५४ पूर्वाह्न 
अरे भाई अपना तो प्रधानमंतरी भी फ़र्जी डाक्टर निकला । ज्यों ज्यों दवा दी मर्ज बढ़ता गया।

: केवल राम : ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ १०:४२ पूर्वाह्न 
एक अच्छी अपील ….यह तो वही जानता है जो डॉ बनता है ….लेकिन जो नाम का डॉ है उसका क्या कहना ……अब हमें भी नर्स की तलाश करनी पड़ेगी ….हा..हा…हा..!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ११:२८ पूर्वाह्न 
जागरूक करने वाली पोस्ट … नकली डॉक्टर से बचना ज़रूरी …नर्स से शादी कर डॉक्टर बनते पहली बार जाना ..

vidhya ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ११:५३ पूर्वाह्न 
सच में सतर्क रहना ज़रूरी है….

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ २:२१ अपराह्न 
नकली डॉक्‍टरों से बचना जरूरी है .. वैसे अगली पोस्‍ट में ज्‍योतिषियों का नंबर तो नहीं है ??

arvind ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:०३ अपराह्न 
vaise aapne dr. banane ke achhe-achhe jugaar bataaye hain..lekin saavdhaan rahane ki jarurat hai aise dr helth our samaaj dono ke liye khataranaak hain…ab to certificat dekh ke hi yakin karunga ..nahi to pata nahi kitane log…blogger friends bhi dr banake ghoom rahe hain. jo sach me kabil dr ya phd hain unpe kyaa beet rahi hogee ye sochne kee baat hai……ek baat to tay hai ki naam ke pahle dr lagaanevalo ki sankhya kaafi badh gayee hai our mahatv lkam ho gayaa hai.

S.M.HABIB ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:१८ अपराह्न 
एक चिंतनीय आलेख…
सादर…

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:२९ अपराह्न 
सार्थक चर्चा के लिए हार्दिक बधाई।

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ३:५१ अपराह्न 
एक नर्स से शादी करके डॉक्टर हो गया।
हा हा हा ! यह भी खूब रही . अभी तक तो यही सुना था की डॉक्टर की पत्नी doktarni .

नकली डॉक्टर्स से तो सावधान रहना ही चाहिए . आखिर जान माल का मामला है .

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ४:३१ अपराह्न 
जागरूक करने वाली पोस्ट … ऐसे डॉक्टरों से बचकर रहने में ही समझदारी है…

दीपक बाबा ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ५:०९ अपराह्न 
एक नर्स से शादी करके डॉक्टर हो गया।

क्या दिकत है यार……
पत्नी सरपंच बनी…. पति सरपंच हो गया…
पत्नी पञ्च बनी…… श्रीमान जी पञ्च हो गए….
पत्नी मास्टरनी बनी ……….. श्रीमान जी मास्टरजी हो गए…..

यही भारत है मेरी जान .

ताऊ रामपुरिया ने कहा… 

on 

 ८ अगस्त २०११ ७:१३ अपराह्न 
इस महंगी शिक्षा के युग में यह जोगाड बताने के लिये ब्लाग संसद, आपका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने की सिफ़ारिश करेगी, अगले सत्र में यह प्रस्ताव रखा जायेगा.

रामराम.

हेमन्‍त वैष्‍णव ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ ८:१० पूर्वाह्न 
डॉक्टर फ़लाँ फ़लाँ बीए, एम ए, एम बी बी एस, एफ़ आई सी आर एम पी।
डॉक्टर के उम्र के अंदाजा लगावत हवं ☺

ajit gupta ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ ८:३४ पूर्वाह्न 
इस देश में जितने भी शोधार्थी है उन्‍हें आपके बताए नुस्‍खे काम में लेने ही पड़ते हैं। बहुत अच्‍छी पोस्‍ट है, बधाई।

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ १०:३३ पूर्वाह्न 
क्या बात है. महराज हमने एक पोस्ट डाला था अभियांत्रिकी निकाय की अपेक्षा चिकित्सा निकाय कि ओर रुझान कम क्यों.
उसी का विश्लेषणात्मक रूप पढने को मिला. सुन्दर आकर्षक ढंग से लिखा हुआ. आज आदमी क्या करे समझ नहीं आता
बड़े बड़े डिग्री धारी भी पहले तमाम टेस्ट करवाओ बोलते हैं फिर इलाज करते हैं. गाँव में तो एक डिग्री याद आती है
व्ही व्ही एस आर एम पी आर एस यू (वैद्य विशारद रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर रविशंकर यूनिवर्सिटी)….शानदार लेख…बधाई

मनोज कुमार ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ २:०३ अपराह्न 
समाज की सच्चाई को उकेरा है आपने।

ब्रह्मचारी अनंतबोध चैतन्य ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ २:२२ अपराह्न 
सत्यं सत्यं वदन्तु भवन्तः ।

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 

on 

 ९ अगस्त २०११ ३:५७ अपराह्न 
अब क्‍या बचें
हम तो फंस गए
http://avinash.nukkadh.com/2011/08/blog-post.html
तोते थे नहीं अपने पास
फिर भी सारे उड़ गए

Vijay Kumar Sappatti ने कहा… 

on 

 १० अगस्त २०११ ५:१२ अपराह्न 
aapne sahi kaha lalit ji .. aajkal doctory padhaana bhi sirf karodpatiyo ka hi kaam rah gaya hai …. aur jhola chaap doctaro ki wajah se jaane kitne saari maute hoti hai ….

aapka lekh bahut saarthak aur samay ke anuroop hai ..

badhayi

डॉ महेश सिन्हा ने कहा… 

on 

 १४ अगस्त २०११ ९:५२ अपराह्न 
इन साठ सालों में सरकार ने किया क्या है जो उससे कोई उम्मीद रखी जाये।
सार्थक पोस्ट

Advertisements

Entry filed under: Uncategorized.

मिस्टर टेटकू राम! स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन फ़्रेंडशिप डे और ढिंग चाक ढिंग चाक

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

w

Connecting to %s

Trackback this post  |  Subscribe to the comments via RSS Feed


तिथि-पत्र

अगस्त 2011
सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि
« जुलाई    
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
293031  

Most Recent Posts


%d bloggers like this: