अभी तो यह अंगडाई है, आगे और लडाई है

अगस्त 30, 2011 at 3:43 अपराह्न टिप्पणी करे

ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, २९ अगस्त २०११

 

किसी को ना हो सका इसके कद का अंदाजा
आसमान है यह सर झुकाए बैठा है………
रात को बादल गरज रहे थे, बिजलियाँ चमक रही थी. बादलों की गड़गड़ाहट कुछ अधिक शोर कर रही थी, जैसे बादलों में युद्ध हो रहा हो अपनी-अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए. बादलों के बीच नहीं, लेकिन संसद में अवश्य जन विश्वास कायम रखने की लडाई चल रही थी. भारत का नया इतिहास लिखा जा रहा था. एक फक्कड़ फकीर के ललकार से कानून बनाने पर सहमति हो रही थी. मुसलाधार बरसात होने लगी. तभी समाचार मिला कि फकीर की बात मान ली गई. सत्य कभी पराजित नहीं होता यह एक बार फिर सिद्ध हो गया. सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, का उपदेश भारतीय दर्शन ने दिया है और यह प्रत्येक काल में कसौटी पर खरा उतरा है. अगर इतिहास के पन्ने पलटे जाएँ तो दृष्टिगोचर होता है कि किसी भी क्रांति का नेतृत्व जमीन से जुड़े आदमी ने ही किया है और उसे सफल बनाया है. सत्य हलाकान परेशान होता है पर पराजित नहीं होता. असत्य कभी विजयी नहीं होता. दमन की उमर कम होती है. एक दिन उसे आत्म समर्पण करना ही पड़ता है. अन्ना के नेतृत्व में देश का आत्मबल परीक्षा में खरा उतरा. दूसरी आजादी की लडाई में एक कदम आगे बढे हैं. 16 अगस्त से प्रारंभ हुयी लडाई अभी ख़त्म नहीं हुयी है. अभी इसे आगे भी चलना है. जब तक देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग ना हो जाये, तब तक आजादी की दूसरी लडाई जारी रहेगी.
आजादी के बाद से लेकर आज तक हम अपने वोट से सरकार चुनते आये हैं. अपनी बात कहने के लिए प्रतिनिधि विधानसभा एवं लोकसभा में भेजते हैं. प्रतिनिधि चयनित होते ही ये व्यवहार बदलकर जनता के सेवक से जनता के मालिक बन जाते हैं. आम आदमी इसे ही अपनी नियति समझ कर  अपने भाग्य को कोसता रहता है. राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के समय ऐसे उम्मीदवारों की तलाश करती हैं जो धन से मजबूत हो. चुनाव में अधिक से अधिक धन खर्च कर सके. वोट खरीदने के बाद जन-धन को लूटना इनका अधिकार बन जाता है. साम-दाम-दंड-भेद सब लगा दिए जाते हैं चुनाव जीतने के लिए. व्यवस्था भी इन्होने अपने हिसाब से बदल ली, अगर किसी मतदाता के पास 10,000 रूपये नहीं है तो वह प्रत्याशी नहीं बन सकता. कुल मिलाकर धनवानों का ही पक्ष मजबूत है. भ्रष्ट्राचार इतना अधिक बढ़ गया कि आम आदमी का जीना मुहाल हो गया है. आम जन अगले ५ बरस का चुनाव का इंतजार करता है, जिससे वह प्रतिनिधि एवं सरकार बदल सके. अब देश में बदलाव की बयार आ गई, जनता अपने अधिकारों के प्रति अन्ना के सार्थक प्रयास से जागरूक हो रही है.
सेवक जब मालिक का व्यवहार करने लगे, आम मुख्तियार ही मालिक बन जाये तब असली मालिक को जागना ही पड़ता है. बाड़ ही खेत खाने लगी. ऊँचे स्तर पर हो रहे भ्रष्ट्राचार की खबर आम आदमी तक नहीं पहुचती. पर निचले स्तर पर छोटे-छोटे कार्यों के लिए पैसे देना उसे नागवार गुजरता है. आज जनता के दबाव ने दिल्ली को भ्रष्ट्राचार के खिलाफ कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया. सभी जानते हैं कि एक बिल पास कर संस्था के गठन से भ्रष्ट्राचार समाप्त नहीं हो जायेगा. इसके लिए नागरिकों को भी अपने कर्तव्यों ध्यान रखना पड़ेगा. संकल्प लेना पड़ेगा कि स्वयं भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा नहीं देंगे, न किसी से रिश्वत लेंगे न किसी को रिश्वत देंगे.भ्रष्ट्राचरण के विरुद्ध सतत आन्दोलन जारी रखना पड़ेगा. तभी भ्रष्ट्राचार रूपी दानव से पार पाया जा सकता है. भ्रष्ट्राचार से अमीरी और गरीबी के बीच गहरी खाई का निर्माण हो चूका है. अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और भी गरीब.  एक तरफ अन्न गोदामों में सड़ रहा है, दूसरी तरफ गरीब दाने – दाने को मोहताज है. उड़ीसा के कोरापुट में गरीबी से त्रस्त होकर एक आदमी ने २० हजार में अपने बच्चे को बेच दिया. इस युग में भी ऐसे समाचार सामने आते हैं तो पीड़ा होती है.
अन्ना के आन्दोलन में सरकार ने रोड़े तो खूब अटकाए पर जन समर्थन साथ होने के कारण मुंह की खानी पड़ी. आन्दोलन के दौरान अन्ना को भगोड़ा तथा भ्रष्ट्राचारी तक कहा गया. लेकिन कहने वालों ने अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखा, जब देखा तो उसे अपने पर शर्म आई और माफ़ी मांगने लगा. हमने भी देखा बुद्ध के समक्ष अन्गुलिकमाल का ह्रदय परिवर्तन कैसे होता है. अन्ना को धराशायी करने के लिए उसके फ़ौज तक के रिकार्ड निकाल लिए. कहीं कोई कमजोरी तो मिले, जिसकी ढाल बना कर अन्ना का अनशन तुडवाया जा सके. इनका बस चलता तो चलता तो चित्रगुप्त से अन्ना के पूर्व जन्म के भी रिकार्ड मंगवा लेते. वाह अन्ना! आपने इनके लिए कुछ भी नहीं छोड़ा. जीवन की पवित्रता, सुचिता और पारदर्शिता काम आ गई. संसार में चरित्रवान ही सबसे उंचा स्थान ग्रहण करता है. कहा गया है कि निर्धन, धनवान से डरता है, मुरख, विद्वान से डरता है, निर्बल बलवान से डरता है, लेकिन धनवान, विद्वान्, बलवान ये तीनो चरित्रवान से डरते हैं. अन्ना ने इसे सिद्ध करके दिखा दिया. निष्कलंक जीवन जी कर विश्व के समक्ष एक आदर्श कायम कर दिया.
मंहगाई की चक्की में पिसता आम भारतीय कभी सोच भी नहीं सकता था कि कोई ऐसा नेतृत्त्व भी उसके लिए आएगा जो गरीबी-गरीबों एवं मंध्यम वर्ग के लिए सर्वाधिकार प्राप्त सत्ता से टकरा जायेगा. सत्ता भी सोच बैठी थी कि बाबा का हश्र देख कर तो कोई दूसरा दिल्ली को आँख दिखाने की हिम्मत कर बैठेगा. दिल्ली ने भी अन्ना के साथ बाबा जैसा ही व्यवहार किया. यहीं गलती हो गई. कहते हैं ना….. जात भी दी और जगात भी दी. जन आक्रोश के सामने कुछ नहीं टिकता. जेल से भी सादर छोड़ना पड़ा और रामलीला मैदान भी देना पड़ा. सत्ता पोषित कुछ लोग आग उगलते रहे. कुछ जयचंदों ने भी आन्दोलन में सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सके. देश के कोने-कोने से भ्रष्ट्राचार और मंहगाई के विरोध में उठे जनज्वार ने अपनी उपस्थिती मजबूती से दर्ज कर दी. इन्हें औकात दिखा दी. संसद में बिल पर बहस करनी पड़ी, अन्ना की तीन मांगों पर सहमती जतानी पड़ी. यह भारत के गणतंत्र के स्वर्णिम दिन था.

नक्कार खाने में तूती की आवाज कौन सुनता है? यह कहावत सदियों से कही जाती है, लेकिन अब वक्त आ गया, तूती की आवाज भी बुलंद हो चुकी है और उसे सुनना ही पड़ेगा. ये वही सांसद और विधायक हैं जो अपने वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव पर बहस नहीं करते और उसे सर्व सहमती पारित कर दिया जाता है. लेकिन जब आम आदमी के अधिकारों के से जुड़े प्रस्ताव आते हैं तो उन्हें या तो पेश नहीं किया जाता या उसके मुद्दे पर संसद में कई फाड़ दिखाई देने लगते हैं. आम जन से जुड़े हुए कई प्रस्ताव संसद में धूल खा रहे हैं. जिसमे महिला आरक्षण जैसा महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी है. जन लोकपाल पास करने पर दबाव बनते ही संसद में बैठे कई नेताओं को अभी से अपने जेल जाने डर सताने लगा है.  देश की जनता जाग चुकी है, वह दिन भी शीघ्र आएगा जब भ्रष्ट्राचारियों को जेल में बाकी जीवन बिताना पड़ेगा. जनता अपने खून-पसीने की कमाई की पाई-पाई का हिसाब लेगी. अपने चुने हुए जन प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार जिस दिन जनता को प्राप्त हो जायेगा उस दिन आम आदमी को इनके दरबार में हाजिरी नहीं लगानी पड़ेगी, ये स्वयं चलकर उसके पास आयेंगे.
अन्ना के आन्दोलन का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि इस आन्दोलन ने समस्त भारत को पुन: एक सूत्र में बाँध दिया. जे.पी. आन्दोलन के पश्चात् जन लोकपाल बिल के समर्थन में एक ऐसा आन्दोलन हुआ कि देश की जनता सड़कों पर आ गई. जिसमे बच्चे-बूढे-जवान, सभी धर्म, पंथों, एवं आधी आबादी महिलाon  ने भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई. एक दो छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ कर कहीं से भी हिंसा का समाचार नहीं मिला. जबकि कुछ लोगों ने उत्पात करने की भरपूर कोशिश की. यह हमारी सामाजिक समरसता और लोकतंत्र की जीत है, आम आदमी की जीत है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीत है. बाहर खड़े किसी आदमी ने आवाज लगायी और उसकी आवाज संसद के भीतर सुनी गयी. ये जनता की जीत है. इस आन्दोलन पर समूचे विश्व की निगाहें लगी हुयी थी. उन्हें भी इस सफल अहिंसात्मक आन्दोलन से सीख मिली कि भूखा रह कर बिना हथियार उठाये अपनी मांगे मनवाई जा सकती है. अब देश के नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए सतत जागना पड़ेगा. तभी हमारे कामयाब लोकतंत्र का लोहा समूचा विश्व मानेगा. अभी तो यह अंगडाई है, आगे और लडाई है.

 

COMMENTS :

27 टिप्पणियाँ to “अभी तो यह अंगडाई है, आगे और लडाई है…………. ललित शर्मा”

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ५:५८ पूर्वाह्न 
भविष्य में बहुत कुछ छिपा हुआ है? अब देखो किस की बारी है?

पत्रकार-अख्तर खान “अकेला” ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ६:४३ पूर्वाह्न 
is ldayi me angdaayi ke sath hm sabhi aapke saath hain lalit bhai .akhtar khan akela kota rajsthan

आशा ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ७:१२ पूर्वाह्न 
बहुत सार समेटे लेख |
आशा

वाणी गीत ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ८:०७ पूर्वाह्न 
जनता की यह एकजुटता बनी रहे तो कुछ भी असंभव नहीं !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ८:१५ पूर्वाह्न 
जन चेतना का विकास तो हुआ है।

दर्शन कौर’ दर्शी ‘ ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ८:२१ पूर्वाह्न 
आखिर सच की जीत हर युग में हुई हैं ….अब हमारा यह फर्ज बनता हैं की हम इसे कैसे संभल पाते है ..?

Surendra Singh Bhamboo ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ८:३७ पूर्वाह्न 
यह जनता की जीत है। लेकिन जनता को यह ध्यान भी रखना है कि आगे चुनाओं में सही व इमानदार व योग्य नेता ही चुने ताकि भ्रष्टाचार की जड़ ही न पनपे
ललीत जी बहुत ही अच्छे सार ग्रभीत लेख के लिए धन्यवाद

S.M.HABIB (Sanjay Mishra ‘Habib’) ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ८:५२ पूर्वाह्न 
शानदार आलेख भईया… बस एक ही प्रार्थना है कि अंगड़ाई लेता यह जनसैलाब पुनः ना सो जाए, बल्कि अंगड़ाई के बाद की अधिक महत्वपूर्ण लड़ाई के तैयार रहे… क्योंकि आगे कि लड़ाई स्वयम अपने आप से लडनी होगी… तभी किसी भी प्रकार का क़ानून सार्थक हो सकता है…
जयहिंद.

अशोक बजाज ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ९:१० पूर्वाह्न 
पठनीय व प्रशंसनीय पोस्ट .

पोला पर्व की बधाई .

Murari Pareek ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ १०:१३ पूर्वाह्न 
Badhai ho sabhi ko

Arunesh c dave ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ १०:२७ पूर्वाह्न 
जय अन्ना जी की गुरूदेव अभी तो अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है

anu ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ११:०७ पूर्वाह्न 
समस्त हिन्दुस्तान का एक सूत्र में बांध जाना ही संकेत है ……आने वाले वक़्त में अच्छा ही होगा ….इसका सारा श्रेय अन्ना जी को ही जाता है

vidhya ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ११:३२ पूर्वाह्न 
बहुत सार समेटे लेख |

संगीता पुरी ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ११:५३ पूर्वाह्न 
अभी तो यह अंगडाई है, आगे और लडाई है. 
एक एक पंक्तियों से सहमत .. बहुत सटीक और सार्थक लेख !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ १२:०४ अपराह्न 
आज 29 – 08 – 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है …..

…आज के कुछ खास चिट्ठे …आपकी नज़र .तेताला पर

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ १:१६ अपराह्न 
सारगर्भित लेख…

रेखा ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ २:०६ अपराह्न 
अभी तो आगे बहुत कुछ करना है …जिसके संकेत अन्नाजी ने अस्पताल जाते -जाते दे ही दिए हैं

संध्या शर्मा ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ २:२७ अपराह्न 
किसी को ना हो सका इसके कद का अंदाजा
आसमान है यह सर झुकाए बैठा है………
सब कुछ कह दिया आपने… वाह जवाब नहीं…

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ २:५३ अपराह्न 
इनका बस चलता तो चलता तो चित्रगुप्त से अन्ना के पूर्व जन्म के भी रिकार्ड मंगवा लेते. वाह अन्ना! आपने इनके लिए कुछ भी नहीं छोड़ा. जीवन की पवित्रता, सुचिता और पारदर्शिता काम आ गई. संसार में चरित्रवान ही सबसे उंचा स्थान ग्रहण करता है. कहा गया है कि निर्धन, धनवान से डरता है, मुरख, विद्वान से डरता है, निर्बल बलवान से डरता है, लेकिन धनवान, विद्वान्, बलवान ये तीनो चरित्रवान से डरते हैं. अन्ना ने इसे सिद्ध करके दिखा दिया. निष्कलंक जीवन जी कर विश्व के समक्ष एक आदर्श कायम कर दिया.

बहुत सारगर्भित लेख … अभी तो लड़ाई जारी है … और यह लड़ाई सरकार के साथ साथ स्वयं से भी है … बहुत बढ़िया पोस्ट

rashmi ravija ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ३:०८ अपराह्न 
बहुत ही गहन विवेचन….इस आन्दोलन से कुछ तो अच्छा निकल कर आएगा ही.

मदन शर्मा ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ७:०८ अपराह्न 
यह जनतंत्र की ही जीत है कि सरकार देर से ही सही, आखिरकार एक मजबूत लोकपाल के लिए अन्ना हजारे और उनके साथियों की तीन प्रमुख मांगों पर संसद के इसी सत्र में बहस कराने को तैयार हो गई है।

सुन्दर प्रेरक प्रस्तुति के लिए आभार

ajit gupta ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ७:३० अपराह्न 
बहुत अच्‍छा आलेख। आम आदमी की जीत की बधाई।

डॉ टी एस दराल ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ८:०८ अपराह्न 
अन्ना ने देश को एक कर दिया । अब तो सही मायने में लोकतंत्र आकर ही रहेगा ।

Atul Shrivastava ने कहा… 

on 

 २९ अगस्त २०११ ९:२३ अपराह्न 
अच्‍छा लेख।
इस आंदोलन ने देश में एकजुटता का अच्‍छा संकेत दिया……….
आभार आपका

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali ‘Rajnish’) ने कहा… 

on 

 ३० अगस्त २०११ ६:५१ पूर्वाह्न 
बिलकुल, यह लडाई जारी रहनी चाहिए।

——
कसौटी पर शिखा वार्ष्‍णेय..
फेसबुक पर वक्‍त की बर्बादी से बचने का तरीका।

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा… 

on 

 ३० अगस्त २०११ १२:१३ अपराह्न 
जनमत में बहुत ताकत है, फिर साबित हो गया है। मगर आम जन को भी अपने स्वयं के स्तर पर स्वयं के द्वारा किये जाने वाले भ्रष्टाचार को छोडना होगा, तभी आंदोलन वास्तव में सफल होगा।

ताऊ रामपुरिया ने कहा… 

on 

 ३० अगस्त २०११ ४:२३ अपराह्न 
जनता जाग गई है इब.

रामराम

Read More: http://lalitdotcom.blogspot.com/2011/08/blog-post_29.html

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अन्ना तुम संघर्ष करो…हम तुम्हारे साथ हैं

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